डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
मुझे आप समस्त अध्यवसायी शिष्या-शिष्यवृन्द और प्रबुद्ध मित्रमण्डल पर गर्व है, जिनमें प्रबल जिजीविषा (जीने की इच्छा) है और जिगीषा (जीतने की इच्छा) भी। आप अपनी इस विजयिनी शक्ति को कहीं से भी शिथिल न पड़ने दें।
अप्रत्याशित शब्द-निर्झरिणी के स्रोत का प्रस्फुटन होता है तब उसमें एक निश्चित लयता के साथ प्रवाह होता है; गति होती है; तथा एक दुर्धर्ष मृत्यु-चिन्तन का प्रतिबिम्बन भी होता है, जो प्राय: हमारे अवचेतन में ही वास करते है; परन्तु जब वे चेतना के धरातल से साक्षात् करते हैं तब मन-प्राण आन्दोलित हो उठते हैं। यहीं पर धैर्य और संयम का परीक्षित विग्रह आकार ग्रहण करता संलक्षित होता है, जो हृदय को परिष्कृत करता है।
जीवन के प्रति जो मोह होता है, वही व्यामोह का कारण-रूप दिखता है। वास्तव में, मृत्यु-चिन्तन से जीवन के प्रति एक बृहद् दृष्टिबोध जाग्रत होता है, जो इस अवधारणा-धारक को ससीम से ‘असीम’ की ओर ले जाता है। यह सत्य है कि जिसने भी जीवन के ‘अ’ को आत्मसात कर लिया, वह “अथ से इति’ के समग्र को ग्रहण कर लेता है; क्योंकि कर्त्तव्याकर्त्तव्य के मूल दर्शन की मीमांसा करना; निष्पत्ति अर्जित करना तथा उसे ऐहिकता से सम्पृक्त करना उसका ध्येय रहता है, तभी स्वर निनादित होता है, “सर्वे भवन्तु सुखिन:।” उस नाद में ऐसी ऊर्जा होती है, जो मनुष्य को ‘चरैवेति-चरैवेति’ की मूल संकल्पना से जोड़ती है और उस प्रयोजन-सिद्धि हेतु उसका पथ प्रशस्त करती रहती है।
आइए! हम इस संकल्पना को साकार करते हुए, जीवन-दर्शन के कोण को विस्तृत करें।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ मई, २०१९ ईसवी)