शिवत्व की यात्रा : समाधि की देहरी

शरद की स्वच्छ रात्रि थी। आकाश निर्मल, तारकाओं से भरा हुआ, मानो अनन्त का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हो रहा हो। आश्रम के उत्तर दिशा में स्थित उस प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे निरंजन पद्मासन में बैठा था, जहाँ वर्षों पूर्व उसने साधना का प्रथम प्रयास किया था। समय ने उसके भीतर बहुत कुछ परिवर्तित कर दिया था—चिन्तन परिपक्व हुआ था, भाव शुद्ध हुए थे, कर्म सहज हुए थे, और अब नाद की अनुभूति ने उसके अस्तित्व को एक नई गहराई प्रदान कर दी थी। परन्तु आज उसकी साधना में एक अदृश्य दहलीज़ का आभास हो रहा था—मानो वह किसी ऐसे द्वार के समीप पहुँच गया हो जहाँ से लौटना भी सम्भव है और आगे बढ़ना भी।

आचार्य धीरे-धीरे उसके समीप आए और बिना किसी औपचारिकता के उसके सामने आसन पर बैठ गए। कुछ क्षण दोनों मौन रहे। उस मौन में संवाद था, प्रश्न था, और उत्तर भी था।

आचार्य ने गम्भीर स्वर में कहा— “निरंजन, साधना का यह चरण अत्यन्त सूक्ष्म होता है। यहाँ साधक को सबसे बड़ा धोखा स्वयं से ही होता है। उसे लगता है कि उसने कुछ प्राप्त कर लिया है, और वही ‘प्राप्ति’ उसकी अंतिम बाधा बन जाती है। तुम्हें अपने अनुभवों, अपने नाद, अपने शान्ति-बोध—सबको भी त्यागने के लिए तैयार रहना होगा।”

निरंजन ने धीरे से पूछा— “गुरुदेव, यदि अनुभव भी त्याज्य है, तो साधक के पास क्या शेष रहता है? वह किस आधार पर आगे बढ़े?”

आचार्य ने उत्तर दिया— “यही तो बिन्दु है जहाँ साधना ‘आधार’ से ‘निर्आधार’ की ओर जाती है। अभी तक तुम्हारा मन किसी न किसी अनुभव, किसी भाव, किसी शांति को पकड़कर बैठा है। समाधि में प्रवेश के लिए उस पकड़ का भी विसर्जन करना पड़ता है। जब तक ‘मैं अनुभव कर रहा हूँ’ यह भाव है, तब तक द्वैत है। समाधि में अनुभव नहीं रहता, केवल अस्तित्व रहता है।”

निरंजन कुछ क्षण विचार में डूबा रहा। फिर बोला— “क्या इसका अर्थ यह है कि साधक को अपने समस्त आध्यात्मिक अर्जनों से भी विरक्त होना पड़ता है? क्या ज्ञान, भक्ति, नाद—ये सब भी अंततः साधन मात्र हैं?”

आचार्य ने संतोष से उसकी ओर देखा— “हाँ, वे साधन हैं, लक्ष्य नहीं। तुमने राम की मर्यादा को अपने आचरण में उतारा, कृष्ण की गीता को कर्म में जिया, और शिव के वैराग्य को अंतर्मन में अनुभव किया—परन्तु अब तुम्हें इन सबको भी एक सूत्र में पिरोकर उससे आगे जाना है। जैसे दीपक की लौ तुम्हें मार्ग दिखाती है, परन्तु सूर्य उदित होने पर दीपक की आवश्यकता नहीं रहती, वैसे ही साधन तुम्हें दहलीज़ तक लाते हैं, परन्तु प्रवेश तुम्हें अकेले करना होता है।”

निरंजन के भीतर एक हल्की आशंका उठी— “अकेले? क्या गुरु भी उस अवस्था में साथ नहीं रहते?”

आचार्य का स्वर अत्यन्त करुणामय हो गया— “गुरु बाहर से वहाँ तक नहीं आते, क्योंकि वहाँ ‘बाहर’ और ‘भीतर’ का भेद ही समाप्त हो जाता है। परन्तु गुरु का तत्त्व तुम्हारे भीतर सदा उपस्थित रहता है। वास्तव में उसी के प्रकाश में तुम उस दहलीज़ को पार करते हो।”

कुछ देर बाद आचार्य ने उसे एक विशेष ध्यान-विधि बताई—
“आज रात्रि तुम अपने समस्त अभ्यासों को छोड़कर केवल ‘अहम्’ की जड़ को देखो। विचारों को मत रोको, नाद को मत पकड़ो, श्वास को मत साधो। केवल यह देखो कि ‘मैं’ कहाँ उत्पन्न होता है। जब वह बिन्दु स्पष्ट हो जाए, तब उसी में स्थिर हो जाना।”

निरंजन ने पूछा— “यदि भय उत्पन्न हो तो?”

आचार्य ने दृढ़ स्वर में कहा— “भय उसी को होता है जो अपने सीमित अस्तित्व को सत्य मानता है। जब तुम देखोगे कि यह ‘मैं’ भी एक तरंग है, तब भय स्वतः विलीन हो जाएगा। स्मरण रखो—समाधि मृत्यु नहीं है, सीमितता की मृत्यु है।”

रात्रि गहरी हो चुकी थी। सब ओर मौन था। निरंजन ने आँखें बंद कीं और आचार्य के निर्देशानुसार अपने भीतर ‘मैं’ के स्रोत को देखने लगा। प्रारम्भ में विचार उठते रहे—स्मृतियाँ, साधना के अनुभव, गुरु के शब्द—परन्तु उसने उन्हें रोका नहीं, केवल देखा। धीरे-धीरे वे सब जैसे दूर होते गए।

फिर एक सूक्ष्म बिन्दु प्रकट हुआ— एक ऐसा बोध कि “मैं हूँ”। उसने उस बोध को भी देखना प्रारम्भ किया।

अचानक उसे अनुभव हुआ कि यह ‘मैं’ भी किसी गहरे आधार पर टिका हुआ है—मानो यह भी एक प्रतिबिम्ब हो, मूल नहीं। जैसे ही उसका ध्यान उस मूल की ओर गया, एक क्षण के लिए सब कुछ शून्य हो गया—न विचार, न अनुभव, न साधक, न साधना।

उस शून्यता में भय का एक सूक्ष्म स्पर्श हुआ, परन्तु उसी क्षण उसे आचार्य का वचन स्मरण हुआ— “मर्यादा की मृत्यु ही समाधि का द्वार है।” उसने समर्पण कर दिया।

उसके बाद जो हुआ, उसे शब्दों में बाँधना कठिन था। न प्रकाश था, न अंधकार; न ध्वनि थी, न मौन; परन्तु एक अखण्ड उपस्थिती थी—असीम, अचल, निरन्तर।

उसे लगा वह ध्यान नहीं कर रहा है, वह स्वयं ध्यान का आधार है। समय का बोध समाप्त हो गया।

जब उसकी आँखें खुलीं, तब पूर्व दिशा में प्रकाश फैल रहा था। आचार्य उसके सामने खड़े थे। उनके नेत्रों में करुणा और संतोष था।

निरंजन ने उनके चरणों में प्रणाम किया, परन्तु शब्द नहीं निकले। आचार्य ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा— “तुमने दहलीज़ का स्पर्श कर लिया है। अभी यह स्थायी नहीं है, परन्तु मार्ग स्पष्ट हो गया है। अब तुम्हारा जीवन केवल व्यक्तिगत साधना का नहीं, लोककल्याण का माध्यम होगा। क्योंकि जिसने अपने ‘मैं’ की सीमितता को देखा है, वह सबमें उसी एक तत्त्व को देखता है।”

निरंजन ने धीरे से कहा— “गुरुदेव, अब मुझे ऐसा लगता है कि शिव कहीं बाहर नहीं हैं। वे उसी शून्य-पूर्णता में हैं जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ का भेद नहीं रहता।”

आचार्य ने उत्तर दिया— “यही शिवत्व का प्रथम साक्षात्कार है—न रूप में, न विचार में, बल्कि अस्तित्व की अखण्डता में। अब तुम्हें उस अनुभूति को जीवन के प्रत्येक कर्म, प्रत्येक संबंध और प्रत्येक श्वास में उतारना है। यही वास्तविक परीक्षा है।”

सूर्य उदित हो चुका था। पीपल के पत्तों से छनकर आती प्रकाश-रेखाएँ भूमि पर नृत्य कर रही थीं। निरंजन ने उस प्रकाश को देखा और उसे लगा— वह प्रकाश बाहर नहीं, भीतर भी उतना ही उज्ज्वल है।

उस क्षण उसे स्पष्ट हो गया— समाधि कोई अन्त नहीं है, वह एक नये जीवन का आरम्भ है— जहाँ व्यक्ति विराट का माध्यम बन जाता है और उसी अनुभूति के साथ उसकी यात्रा का अगला चरण प्रारम्भ हुआ—
समाधि से सेवा की ओर और प्रकाशना से समाज की ओर।


डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव