शिवत्व की यात्रा मे मर्यादा, प्रेम और त्याग का अग्निसंस्कार

आश्रम में उस दिन एक गंभीरता थी। प्रभात की वायु में भी जैसे कोई गूढ़ संकेत था। निरंजन शिवालय के सामने बैठा था, पर आज उसका ध्यान स्थिर नहीं था। उसके भीतर एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था—
“जब प्रेम और धर्म के बीच चयन करना पड़े तो क्या करना चाहिए?”

Image

उसे स्मरण आया—आचार्य ने एक दिन कथा कही थी— जब शिव ने देवी सती से अनन्त प्रेम होते हुए भी, उनके द्वारा श्रीराम की मर्यादा की परीक्षा लेने पर, उन्हें त्याग दिया था।
वह त्याग क्रोध का नहीं था, धर्म की रक्षा का था।

उस दिन निरंजन को यह कथा केवल पौराणिक लगी थी,
आज वह उसके जीवन का प्रश्न बन गई थी।


आश्रम में एक युवती आई थी—दीपा। वह विद्या के लिए आई थी, पर उसकी श्रद्धा और सरलता ने निरंजन के मन में एक सूक्ष्म स्नेह जगा दिया था। निरंजन स्वयं से भयभीत था।
यह आकर्षण था या करुणा? स्नेह था या ममता?

उसे लगा— साधना के इतने वर्षों बाद भी मन में तरंगें उठ रही हैं। वह आचार्य के पास गया— “गुरुदेव! यदि किसी के प्रति प्रेम उत्पन्न हो जाए, तो क्या वह साधना में बाधा है?”

आचार्य ने सीधे उत्तर नहीं दिया। उन्होंने पूछा— “वह प्रेम तुम्हें बाँधता है या मुक्त करता है?” निरंजन मौन हो गया।


सायंकालीन सत्संग में आचार्य ने कथा सुनायी— “शिव तप हैं, प्रेम हैं, नृत्य हैं और नाद भी हैं। परन्तु वे मर्यादा के रक्षक भी हैं। जब देवी सती ने श्रीराम की परीक्षा ली, तब वह केवल एक घटना नहीं थी— वह मर्यादा का प्रश्न था। शिव ने सती को त्यागा नहीं, अपनी मर्यादा को बचाया।”

उन्होंने आगे कहा— “धर्म के लिए किया गया त्याग वैराग्य नहीं, उच्चतर प्रेम है।” निरंजन के भीतर जैसे कोई गाँठ खुली। उसे समझ आया— शिव का त्याग प्रेम का विरोध नहीं था, प्रेम की शुद्धि था।


आचार्य ने कहा— “शिवत्व की यात्रा में दो ध्रुव हैं— एक राम की मर्यादा और दूसरा कृष्ण की गीता।

राम सिखाते हैं कि कर्तव्य सर्वोपरि है और कृष्ण सिखाते हैं कि निष्काम होकर कर्म करो।”

उन्होंने गीता का श्लोक कहा— ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।’
(गीता 3.35)

“अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है, दूसरे के धर्म का पालन भयावह है।”

निरंजन ने अनुभव किया— अब तक वह साधना कर रहा था,
पर आज उसे जीवन का धर्म समझना था।


अगले दिन दीपा ने निरंजन से एक प्रश्न पूछा—
“क्या मैं यहाँ रहकर आपकी तरह साधना कर सकती हूँ?”

उसकी आँखों में श्रद्धा थी, पर साथ ही एक भाव भी था—
आश्रय का। निरंजन ने अपने भीतर देखा और विचार किया यदि वह उसे आश्रय देगा तो क्या वह उसके लिए गुरु बनेगा
या संबंधों के जाल में उलझ जाएगा!

उसे शिव का स्मरण हुआ। राम की मर्यादा का स्मरण हुआ।
कृष्ण की गीता का स्मरण हुआ।

उसने शांत स्वर में कहा— “दीपा, साधना का मार्ग व्यक्तिगत है। तुम्हें आचार्य के मार्गदर्शन में चलना चाहिए, मेरे सहारे नहीं।”

दीपा ने सिर झुका लिया। उसकी आँखों में क्षणिक पीड़ा थी,
परन्तु साथ ही सम्मान भी। निरंजन के भीतर भी एक वेदना उठी, पर वह स्थिर रहा।

यह त्याग था लेकिन प्रेम का नहीं; आसक्ति का।


उस रात निरंजन ध्यान में बैठा। उसके भीतर भावों की एक अग्नि जल रही थी। वह भाग सकता था, या उस अग्नि में बैठ सकता था। उसने अग्नि को स्वीकार किया।

धीरे-धीरे वह वेदना शांति में परिवर्तित होने लगी। उसे अनुभव हुआ— जब प्रेम मर्यादा में रहता है, तब वह करुणा बन जाता है। जब त्याग धर्म के लिए होता है,
तब वह तप बन जाता है। उसे लगा— आज उसकी साधना का अग्निसंस्कार हुआ।


रात्रि के अंतिम प्रहर में उसने एक सूक्ष्म अनुभूति की। उसे लगा मानो भीतर एक नाद गूँज रहा हो। न कोई शब्द, न कोई ध्वनि; केवल स्पंदन। उसे लगा कि शिव नटराज हैं। सृष्टि उनका नृत्य है। त्याग, प्रेम, मर्यादा, कर्म सब उसी नृत्य की लय हैं।


Image

प्रातः आचार्य ने कहा, “निरंजन! आज तुम्हारी साधना एक और चरण पार कर गई। तुमने प्रेम को त्यागा नहीं, उसे शुद्ध किया है। यही शिवत्व है— तप में प्रेम, प्रेम में मर्यादा, मर्यादा में करुणा।”

निरंजन ने प्रणाम किया। उसके भीतर अब कोई द्वन्द्व नहीं था। उसे लगा कि शिवत्व की यात्रा वास्तव में राम की मर्यादा, कृष्ण की गीता और शिव के वैराग्य का संगम है; उसी संगम में उसकी चेतना धीरे-धीरे विशाल होती जा रही थी।