शिवत्व की यात्रा का दार्शनिक स्वरूप : समाधि से समाज तक

प्रभात का समय था। आश्रम में सामान्य दिनचर्या प्रारम्भ हो चुकी थी—गौशाला में सेवा, रसोई में धूप की सुगन्ध, प्रार्थना का मधुर गान। परन्तु निरंजन के भीतर कुछ असामान्य था। समाधि की उस सूक्ष्म अनुभूति के बाद संसार वही था, किन्तु उसका अनुभव बदल गया था। वृक्षों की हरियाली, आकाश की नीलिमा, लोगों के मुखमण्डल—सबमें एक ही चेतना की झलक दिखाई देने लगी थी।

फिर भी उसके भीतर एक गम्भीर प्रश्न उठ रहा था—
“यदि सब शिव ही हैं, तो व्यवहार में भेद क्यों? यदि सबमें वही एक तत्त्व है, तो कर्तव्य, मर्यादा, धर्म, संघर्ष—इन सबका क्या अर्थ रह जाता है?”

उसी विचार में वह आचार्य के समीप पहुँचा। आचार्य नदी-तट पर बैठे थे, जल की धारा को निहारते हुए।

निरंजन ने विनम्र स्वर में कहा—
“गुरुदेव, समाधि में तो सब एक-सा प्रतीत होता है। वहाँ न मित्र है, न शत्रु; न लाभ है, न हानि। परन्तु जैसे ही मैं व्यवहार में आता हूँ, भेद फिर दिखाई देने लगता है। क्या यह द्वैत पुनः अज्ञान है?”

आचार्य ने उसकी ओर गम्भीर दृष्टि से देखा और कहा—

“निरंजन, यह वही स्थान है जहाँ अनेक साधक भ्रमित हो जाते हैं। वे या तो समाधि में ही ठहर जाना चाहते हैं, या संसार को मिथ्या कहकर त्याग देना चाहते हैं। परन्तु शिवत्व इन दोनों के पार है। शिव न केवल समाधिस्थ योगी हैं, वे गृहस्थ भी हैं; वे कैलास के मौन में भी हैं और श्मशान के ताण्डव में भी। अतः शिवत्व का अर्थ है—अद्वैत की अनुभूति को द्वैत के व्यवहार में संतुलित करना।”

निरंजन ने आगे पूछा—
“परन्तु यह संतुलन कैसे सम्भव है? जब सब एक है, तो न्याय-अन्याय का निर्णय किस आधार पर होगा?”

आचार्य ने उत्तर दिया—

“अद्वैत का बोध अस्तित्व का सत्य है, और धर्म का आचरण व्यवहार का सत्य। इन दोनों को विरोधी मत समझो। जैसे आकाश सर्वत्र एक है, परन्तु पात्र के अनुसार जल का आकार बदलता है, वैसे ही चेतना एक है, परन्तु परिस्थितियों के अनुसार कर्तव्य भिन्न होते हैं। शिवत्व का अर्थ है—भीतर अद्वैत की शांति और बाहर धर्म की सजगता।”

उन्होंने आगे कहा—

“स्मरण करो, शिव ने समुद्र-मंथन का विष पिया। यदि वे केवल समाधिस्थ रहते, तो संसार विनष्ट हो जाता। उन्होंने विष को कण्ठ में धारण किया—न उसे भीतर उतारा, न बाहर फैलने दिया। यही शिवत्व का प्रतीक है। संसार का विष—अज्ञान, अन्याय, द्वेष—तुम्हें दिखाई देगा। उसे न तो अपने हृदय में उतारो, न ही प्रतिशोध में उगलो; उसे सजगता से धारण करो और करुणा से रूपान्तरित करो।”

निरंजन के नेत्रों में प्रश्न की अग्नि और भी प्रखर हो उठी—
“क्या इसका अर्थ यह है कि साधक को अन्याय के सामने भी शांत रहना चाहिए?”

आचार्य का स्वर अब अधिक दृढ़ था—

“शांति का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। शिवत्व का अर्थ कायरता नहीं, साहस है। जब भीतर अहंकार नहीं रहता, तब कर्म शुद्ध होता है। तब संघर्ष भी करुणा से प्रेरित होता है, क्रोध से नहीं। स्मरण रखो—शिव का ताण्डव विनाश के लिए नहीं, संतुलन के लिए है।”

कुछ क्षणों का मौन छा गया। नदी का जल बहता रहा। आचार्य ने फिर कहा—

“शिवत्व के तीन दार्शनिक आयाम हैं। प्रथम—अद्वैत-बोध; यह जानना कि समस्त अस्तित्व एक ही चेतना का विस्तार है। द्वितीय—वैराग्य; यह समझना कि कुछ भी स्थायी नहीं है, इसलिए आसक्ति मूढ़ता है। तृतीय—करुणामय कर्म; यह स्वीकार करना कि जब तक शरीर है, तब तक कर्म है, और कर्म को धर्मानुकूल होना चाहिए।”

निरंजन ने गहराई से पूछा—
“यदि सब कुछ उसी एक चेतना का विस्तार है, तो पाप और पुण्य का क्या अर्थ? क्या वे भी उसी खेल का भाग हैं?”

आचार्य ने उत्तर दिया—

“अद्वैत के स्तर पर पाप-पुण्य का भेद नहीं है, परन्तु व्यवहार के स्तर पर यह भेद अनिवार्य है। जैसे स्वप्न में सब तुम्हारे ही मन की रचना है, परन्तु स्वप्न के भीतर नियम रहते हैं—वैसे ही संसार ब्रह्म की लीला है, परन्तु लीला में मर्यादा है। राम की मर्यादा और कृष्ण की गीता इसी व्यवहार-सत्य की स्थापना करते हैं। शिवत्व इन दोनों को आत्मसात् कर उन्हें करुणा में परिणत करता है।”

निरंजन अब मौन था। उसके भीतर जैसे सूत्र जुड़ रहे थे। उसने धीरे से कहा—

“तो क्या शिवत्व का अर्थ है—जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सजग रहना? चाहे परिवार हो, समाज हो, या संघर्ष?”

आचार्य ने उत्तर दिया—

“हाँ। शिवत्व कोई पलायन नहीं, एक परिपक्वता है। जब तुम प्रत्येक संबंध में अहंकार के स्थान पर उत्तरदायित्व से व्यवहार करते हो, जब तुम्हारा प्रेम मर्यादा से बंधा होता है, जब तुम्हारा त्याग आत्मप्रदर्शन नहीं, धर्म की रक्षा के लिए होता है—तब तुम शिवत्व की ओर बढ़ते हो।”

उन्होंने और भी गहराई से जोड़ा—

“समाधि में तुम्हें जो अनुभव हुआ वह बीज है। अब उसे समाज की भूमि में रोपना है। यदि तुम्हारी अनुभूति केवल तुम्हारे आनंद तक सीमित रह गई, तो वह अधूरी है। शिवत्व का वास्तविक अर्थ है—व्यक्ति का विराट के प्रति समर्पण, और विराट का व्यक्ति के माध्यम से कार्य करना।”

निरंजन ने अनुभव किया कि समाधि का सुख अब उत्तरदायित्व में बदल रहा है। उसे लगा—अब वह केवल साधक नहीं रहा; वह एक सेतु है।

उसने अंतिम प्रश्न किया—
“गुरुदेव, क्या कभी ऐसा क्षण आता है जब साधक पूर्णतः शिवत्व को प्राप्त कर लेता है?”

आचार्य मुस्कुराए—

“शिवत्व कोई उपलब्धि नहीं है जिसे प्राप्त कर लिया जाए। वह तुम्हारे स्वभाव का उद्घाटन है। जब आवरण हटते जाते हैं, तब वह प्रकट होता जाता है। यह यात्रा अनन्त है—क्योंकि चेतना अनन्त है।”

सूर्य ऊपर आ चुका था। नदी की लहरों पर प्रकाश झिलमिला रहा था। निरंजन ने उस झिलमिलाहट को देखा और उसे लगा—प्रकाश जल में प्रतिबिम्बित है, परन्तु जल प्रकाश नहीं बन जाता। उसी प्रकार चेतना शरीर में प्रतिबिम्बित है, परन्तु शरीर चेतना नहीं बन जाता। यह भेद समझना ही विवेक है, और इस विवेक में स्थिर रहना ही शिवत्व की साधना।

उसने आचार्य के चरणों में प्रणाम किया। अब उसके भीतर समाधि का आकर्षण नहीं था, न ही संसार से विरक्ति की उत्कंठा। उसके भीतर केवल एक स्पष्टता थी—
भीतर शून्य की शांति,
बाहर धर्म का कर्म,
और दोनों के मध्य करुणा का सेतु।

यही शिवत्व का दार्शनिक अर्थ था— अद्वैत में स्थित होकर द्वैत का संतुलन।