”सही उच्चारण के लिए संस्कृत और फ़ारसी का ज्ञान आवश्यक है”– फ़िराक़ गोरखपुरी

‘सर्जनपीठ’ का ‘अज़ीम शाइर फ़िराक़ गोरखपुरी और उनकी सार्वकालिक रचनाशीलता’ विषयक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक आयोजन


प्रयागराज। एक ख़ूबसूरत एहसास का नाम है, फ़िराक़। ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई के साथ-साथ, समालोचना और इतिहास पर भी क़लम चलानेवाले रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी यदि ज़िन्दा हैं तो अपनी शाइरी मे। ‘गुल-ए-नग़्मा’, ‘मश्अल’, ‘नग़्म-ए-साज़’, ‘गुलबाग़’, ‘रूप’ को रचते हुए जिया तो ‘साधु और कुटिया’,सत्यं-शिवं-सुन्दरम्’ के यथार्थ को भोगा भी। वे ताक़यामत अपनी इन कृतियों मे ज़िन्दा बन्द रहेँगे। ऐसे शाइर की पुण्यतिथि ३ मार्च के अवसर पर ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे ‘अज़ीम शाइर फ़िराक़ गोरखपुरी और उनकी सार्वकालिक रचनाशीलता’/विषयक एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन ‘सारस्वत सदन-सभागार’, अलोपीबाग़, प्रयागराज से किया गया था।

  उर्दू-विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के निवर्तमान अध्यक्ष प्रो० सग़ीर अफ़्राहिम ने मुख्य अतिथि के रूप मे कहा, "फ़िराक़-जैसे संवेदनशील शाइर की रुबाइयोँ मे अपनी कौमी और वतनी जज़्बे की झंकार साफ़ सुनायी देती है। फ़िराक़ साहिब की रचनाओँ मे प्राकृतिक चित्रण नयेपन के साथ है। उनमे जीवन-मरण, ज़िन्दगी की सच्चाई तथा जीवनमूल्य का बोध प्रतिबिम्बित होता है। उनकी काव्यरचनाओँ मे यमक, रूपक इत्यादिक अलंकारोँ का मनोरम रूप प्राप्त होता है।"

   उर्दू ऐकडेमी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मे निदेशक प्रो० राहत अबरार ने अध्यक्ष के रूप मे बताया, "फ़िराक़ साहिब की शाइरी मे अद्भुत सौन्दर्यबोध की झलक मिलती है। यही कारण है कि उनकी शाइरी मे विविध प्रकार के हिन्दुस्तानी रंग दिखते हैँ। उनकी कृतियाँ संस्कृत-श्लोक की भाव-प्रवणता से प्रभावित दिखती हैँ। यही कारण है कि उनकी यही विविधता उन्हेँ दूसरोँ से बड़ा बना देती है।"

 इस सारस्वत आयोजन मे शाइर श्रीराम मिश्र 'तलब जौनपुरी' ने विशिष्ट अतिथि के रूप मे कहा, "फ़िराक़ साहिब की 'फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू कविता' एक बहुत ही प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसमे उन्होँने उर्दू-कविता के विविध पहलुओँ पर सम्यक् प्रकाश डाला है, जो पाठकोँ को उर्दू-साहित्य के बारे मे  महत्त्वपूर्ण जानकारी देने मे अत्यन्त सहायक सिद्ध हो रही है।''

   आयोजक, व्याकरणवेत्ता और भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, "फ़िराक़ साहिब अशुद्ध हिन्दी बोलनेवालोँ को पसन्द नहीँ करते थे। वे ग़लत उर्दू और अँगरेज़ी बोले अथवा लिखे जाने पर डाँट पिलाने से भी नहीँ चूकते थे। उनका मत था कि सही उच्चारण के लिए फ़ारसी और संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है, हालाँकि उन्होंने संस्कृत-साहित्य भी अँगरेज़ी-माध्यम मे ही पढ़ा था।उनका एक प्रासंगिक शे'र पेश है, ''किसी को चश्मे सियह के पयाम लाये हैं, ये 'मेघदूत' जो मंडला रहे हैं सिलसिलावार।''

आकाशवाणी, प्रयागराज के उद्घोषक कुँवर तौक़ीर अहमद ख़ान ने बताया, "मश्हूर कृति 'गुल-ए- नग़्मा' पर 'ज्ञानपीठ' पुरस्कार से नवाजे़ गये फ़िराक़ साहिब एक ऐसे ज़िन्दादिल शाइर थे, जिन्होँने न सिर्फ़ भाषा की दीवारेँ तोड़ीँ, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वतन्त्रता-आन्दोलन मे भी अपनी आवाज़ बलन्द की थी; डेढ़ वर्षोँ तक कारावास की ज़िन्दगी भी जी थी।"

  'उर्दूघर', इलाहाबाद के महासचिव डॉ० सय्यद हसीन जिलानी ने फ़िराक़ साहिब की शाइरी की विशेषताओँ पर प्रकाश डालते हुए बताया, "फ़िराक़ गोरखपुरी का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि उन्होँने उर्दू-शाइरी मे हिन्दुस्तानी तहज़ीब को बहुत ही सलीक़े के साथ पेश किया है। यही कारण है कि उनकी कृति 'रूप' की रुबाइयाँ' हिन्दुस्तानी रस्मो रिवाज़ मे रची-बसी हैँ।  हमे फ़ख़्र है कि हमारे शहर इलाहाबाद की एक अज़ीम शख़्सीयत फ़िराक़ साहिब का शुमार उर्दू के अज़ीम शाइरोँ मे होता है।"