डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
वर्षा ऋतु का अन्तिम चरण था। आकाश स्वच्छ था, परन्तु वायु में अभी भी जल की शीतलता थी। आश्रम के उत्तर दिशा में एक प्राचीन कक्ष था, जिसे नाद-मण्डप कहा जाता था। वहाँ प्रायः कोई नहीं जाता था। आचार्य ने उस दिन निरंजन को वहीं बुलाया।
नाद-मण्डप में प्रवेश करते ही निरंजन ने एक विचित्र अनुभूति की— दीवारें साधारण थीं, परन्तु भीतर एक सूक्ष्म गूँज थी, मानो मौन भी ध्वनि बन गया हो।
आचार्य मध्य में आसन पर बैठे थे। उन्होंने कहा— “निरंजन, अब तक तुमने ध्यान, कर्म, भक्ति, मौन और त्याग का अभ्यास किया। आज हम उस तत्त्व की ओर बढ़ेंगे जो इन सबका मूल है— नाद।”
निरंजन ने विनम्रता से पूछा— “गुरुदेव, क्या नाद केवल ध्वनि है? या यह उससे भी सूक्ष्म कुछ है?”
आचार्य ने उत्तर दिया— “जो ध्वनि कान से सुनाई देती है वह स्थूल नाद है। जो हृदय में स्पंदन बनकर अनुभव होता है वह सूक्ष्म नाद है और जो चेतना के मूल में निरंतर ध्वनित होता है वही ओंकार है—अनाहत नाद।”
कुछ क्षण मौन रहा। फिर आचार्य बोले— “तुमने शिव को समाधिस्थ भी जाना, वैरागी भी जाना, और करुणामय भी जाना। परन्तु क्या तुमने शिव को नटराज के रूप में जाना है?”
निरंजन ने कहा— “मैंने चित्रों में देखा है, शास्त्रों में पढ़ा है कि नटराज का नृत्य सृष्टि की गति का प्रतीक है। परन्तु उसे अनुभव नहीं किया।”
आचार्य ने गम्भीर स्वर में कहा—
“नटराज का नृत्य केवल कला नहीं है। वह सृष्टि का रहस्य है। सृजन, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह—ये पाँचों क्रियाएँ उसी नृत्य में समाहित हैं। जब चेतना स्थिर होकर भी गतिमान रहती है, तब नटराज प्रकट होते हैं।”
आचार्य ने निरंजन को आँखें बंद करने को कहा। “अपनी श्वास पर ध्यान मत दो, हृदय पर भी नहीं। केवल उस सूक्ष्म ध्वनि को सुनने का प्रयास करो जो किसी बाहरी स्रोत से नहीं आ रही।”
प्रारम्भ में उसे कुछ नहीं सुनाई दिया। फिर धीरे-धीरे उसे लगा—जैसे भीतर कहीं एक बहुत ही सूक्ष्म कम्पन है।
उसने ध्यान गहरा किया। वह कम्पन एक निरंतर गूँज में परिवर्तित होने लगा— न ‘अ’, न ‘उ’, न ‘म’— परन्तु उन तीनों का एक साथ अनुभव। उसने आँखें खोलीं।
“गुरुदेव! यह क्या था? यह कोई ध्वनि नहीं थी, परन्तु ध्वनि जैसी थी।”
आचार्य मुस्कुराए—
“वह अनाहत नाद की प्रथम झलक है। जिसे कोई उत्पन्न नहीं करता, जो स्वयं प्रकट होता है।”
निरंजन ने पूछा—
“क्या यह अनुभव साधना का लक्ष्य है? या केवल एक अवस्था?”
आचार्य ने उत्तर दिया—
“यदि तुम इसे लक्ष्य बना लोगे, तो यह खो जाएगा। यदि तुम इसे साक्षी भाव से अनुभव करोगे, तो यह तुम्हें अपने स्रोत तक ले जाएगा। नाद को पकड़ना नहीं, उसमें विलीन होना है।”
निरंजन ने फिर प्रश्न किया—
“गुरुदेव, नाद और मन का क्या संबंध है?”
आचार्य ने विस्तार से कहा—
“मन की वृत्तियाँ तरंगें हैं। नाद मूल स्पंदन है। जब तुम वृत्तियों को शांत करते हो, तो तरंगें लुप्त हो जाती हैं और मूल स्पंदन प्रकट होता है। इसीलिए योग में कहा गया है—
नादानुसन्धान से चित्त एकाग्र होता है।”
उन्होंने आगे जोड़ा—
“पर सावधान रहो—नाद का अनुभव कोई अलौकिक चमत्कार नहीं है। यह तुम्हारे ही अस्तित्व की ध्वनि है।”
कुछ देर बाद आचार्य खड़े हुए।
उन्होंने धीरे-धीरे एक वृत्त बनाया—जैसे कोई अदृश्य लय हो।
“निरंजन, नृत्य केवल शरीर की गति नहीं है। जब भीतर नाद जागृत होता है, तो शरीर स्वयं लय में आ जाता है। नटराज का नृत्य इसी का प्रतीक है— स्थिरता के भीतर गति, मौन के भीतर संगीत।”
उन्होंने एक श्लोक कहा—
‘नृत्यते देवदेवेशो जगत् सर्वं तदनुगम्।’
अर्थात् देवों के देव शिव नृत्य करते हैं और सम्पूर्ण जगत् उनकी लय का अनुसरण करता है।
निरंजन ने पूछा— “क्या साधक को भी नृत्य करना चाहिए?”
आचार्य ने उत्तर दिया— यदि नृत्य बाहर से होगा तो वह कला होगा। यदि भीतर से होगा तो वह ध्यान होगा।
निरंजन ने अपने पूर्व अनुभवों को स्मरण किया— राम की मर्यादा, कृष्ण का निष्काम कर्म, शिव का वैराग्य।
उसने पूछा— “गुरुदेव, इन सबका नाद से क्या संबंध है?”
आचार्य ने गूढ़ स्वर में कहा— “राम मर्यादा की स्थिरता हैं—यह ‘म’ की गम्भीरता है। कृष्ण कर्म की लय हैं—यह ‘उ’ का विस्तार है। शिव समाधि का मौन हैं—यह ‘अ’ का उद्गम है। जब ये तीनों मिलते हैं, तब ओंकार पूर्ण होता है।” निरंजन की आँखों में आँसू आ गये। ये आँसू आनन्द के थे।
उस दिन के बाद उसकी साधना बदल गई। वह केवल ध्यान में नहीं बैठता था, चलते समय भी नाद सुनने का प्रयास करता था।
कभी उसे लगता कि पत्तों की सरसराहट भी उसी नाद का विस्तार है, नदी की धारा भी उसी की लय है, हृदय की धड़कन भी उसी की ताल है। उसे अनुभव हुआ— संसार शोर नहीं है, यदि भीतर नाद जागृत हो।
सायंकाल में आचार्य ने कहा—
“निरंजन, अब तुम्हारी साधना बाह्य से आन्तरिक और आन्तरिक से सार्वभौमिक हो रही है। जब तुम हर ध्वनि में उसी एक नाद को सुनोगे, तब द्वैत समाप्त हो जाएगा। तभी तुम जानोगे— शिव तप में हैं, प्रेम में हैं, उल्लास में हैं, नृत्य में हैं और नाद में भी हैं।”
निरंजन ने दीर्घ प्रणाम किया। उसके भीतर अब कोई प्रश्न नहीं था— केवल एक गूँज थी— ॐ।