डॉ॰ निर्मल पाण्डेय (इतिहासवेत्ता)

(एक वर्ष पूर्व लिखा गया किन्तु प्रासंगिक लेख)
नक्सलबाड़ी जिस दार्जिलिंग लोकसभा में आता है, दो दिन पहले ही भारतीय जनता पार्टी के राजू बिस्ता उसके सांसद चुने गए हैं, उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार को चार लाख से ज्यादा वोटों से हराया है। कम्युनिस्ट पार्टी को महज पचास हज़ार वोट मिले। ये लगातार तीसरी बार है जब भारतीय जनता पार्टी को संसदीय प्रतिनिधित्व मिला है।
आज 25 मई को नक्सलबाड़ी विद्रोह के आधी सदी से ज्यादा हो गए। आज जिस रूप में नक्सलवाद या माओवाद को देखा जाता है, इसकी शुरुआत बिल्कुल अलग परिस्थितियों में हुई थी। साठ के दशक में पूरा देश कांग्रेस-शासन के दौर में हुई भूमि सुधार की असफलता, युद्ध, अकाल, भूखमरी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। स्वतंत्रता के बाद देखे गए सपने टूट रहे थे। गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के दौर में जनसंघ-लोहियावादी-किसान-मजदूर-पिछड़ावाद, क्षेत्र और भाषा को लेकर होने वाले संघर्षों के दौर में ही नक्सलबाड़ी आंदोलन का भी उभार हुआ।
अपनी कविता ‘पटकथा’ में धूमिल का आक्रोश, असंतोष और चिंता निम्न शब्दों में व्यक्त होती है…
यहाँ जनता एक गाड़ी है
एक ही संविधान के नीचे
भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम
‘दया’ है
और भूख में
तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है। -(पटकथा / धूमिल)
यह आवश्यक नहीं की इस तनी हुई मुट्ठी में हमेशा बंदूक ही हो। अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करते वक्त भी अक्सर हम अपनी मुट्ठियां आज भी भींच लेते हैं। नक्सलबाड़ी आंदोलन का जन्म ‘अराजक हत्याओं’ के लिए नहीं हुआ था बल्कि गरीबों के हक के लिए- सामाजिक जागृति के लिए उठने वाले स्वर के रूप में हुआ था।
1967 में सामाजिक जागृति के लिए शुरु हु्ए इस आंदोलन पर कुछ सालों के बाद राजनीति का दख़ल बढ़ने लगा और आंदोलन जल्द ही अपने मुद्दों और रास्तों से भटक गया। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से आरम्भ हुआ यह आंदोलन जब फैलता हुआ बिहार पहुंचा तब यह अपने मुद्दों से पूरी तरह बेपटरी हो गया। अब यह लड़ाई जमीनों की लड़ाई न रहकर जातीय वर्ग की लड़ाई शुरू हो चुकी थी। यहीं से वह दौर शुरु होता है जब उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग के बीच के उग्र संघर्ष ने नक्सल आन्दोलन को एक नया रूप धारण करने को उकसाया, और माओवादियों के संघर्ष और प्रतिरोध का केंद्र उच्च वर्ग के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन करने में तब्दील हो गया।
‘जनता की राजनीति एक स्वायत्त अधिकारक्षेत्र है’ की उद्घोषणा करने वाले रणजीत गुहा जन-आन्दोलनों के इतिहास को निम्नवर्गीय दृष्टि से देखे जाने की मांग करते हैं। वह मानते है इतिहास लेखन में इस दृष्टिकोण और ऐतिहासिक कालक्रम में जनता की राजनीति का अन्यतम स्थान है, क्योकि यह संभ्रांत राजनीति से अलग स्वायत्त क्षेत्र था और इसका अस्तित्व भी उस पर निर्भर नहीं था। रणजीत गुहा मानते हैं कि जनता की राजनीति संभ्रांतो की राजनीति से कई निर्णयात्मक मामलों में अलग होती है. एक ओर वह चिन्हित करते हैं कि कैसे इसकी जड़, जाति और संबंधो के फैलाव, जनजाति-बंधुत्व, क्षेत्रीयता आदि जैसे परम्परागत जन संगठनों में होती है, वहीं दूसरी ओर गुहा इस बात की ओर इशारा करते है, जिसमे एक तरफ संभ्रांत गोलबंदी की प्रकृति उर्ध्व होती है, दूसरी तरफ जनता की लामबंदी क्षैतिज होती है. संभ्रांत लामबंदी को क़ानूनी दायरे में सीमित और शांत मानते हुए रणजीत गुहा इस बात का खुलासा करते है कि निम्नवर्गीय लामबंदी अपेक्षाकृत उग्र होती है। साथ ही वह जोड़ते हैं कि कैसे सतर्क और नियंत्रित संभ्रांत लामबंदी से इतर निम्नवर्गीय प्रतिरोध स्वतःस्फूर्त अर्थात अचानक उभर कर सामने आती है।
‘द प्रोज ऑफ़ काउंटर इन्सर्जेंसी’ में रणजीत गुहा ने भारत के किसान-कबीला विषयक मौजूदा इतिहासकारों की आलोचना की क्योंकि उनके लेखन में किसान आंदोलनों को आकस्मिक और अनियोजित बताया गया और उनके आंदोलनों में विद्रोह की चेतना को नकारा गया। गुहा बताते हैं कि कैसे उस इतिहास-लेखन में कृषक विद्रोही की चर्चा एक अस्मितायुक्त विद्रोह जो अपनी इच्छाशक्ति और तर्कों के द्वारा प्रतिरोध का एक सकारात्मक माहौल बनाती है, से इतर सिर्फ एक स्थूल व्यक्ति अथवा वर्ग के सदस्य के रूप में की गयी। साथ ही यह भी कि कैसे कृषक-आन्दोलनों को व्यक्त करती हर किंवदंती और आख्यानों का सीधे-सीधे भाषाई आधार पर केवल एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रघटना के रूप में ही चित्रण किया गया.
‘एलिमेंटरी आस्पेक्ट्स ऑफ़ पीजेंट इन्सर्जेंसी इन कोलोनियल इंडिया (1983)’ में रणजीत गुहा विद्रोही-चेतना के तर्कों को परिभाषित करने के क्रम में प्रतिवाद, अस्वीकरण, द्विधार्थकता, रूपवाद, सुदृढ़ीकरण, पारगमन और क्षेत्रीयता जैसे अवधारणात्मक पैमाने विकसित करते हैं. प्रभुत्वशाली भूमिपति, महाजनों और आधिकारिक बिचौलियों के प्रति कृषकों की नकारात्मक बोध द्वारा गुहा कृषक-चेतना को बतौर अस्मिता सम्बन्धी विचार परिभाषित करते हैं। जैसा कि अंतोनियो ग्रामसी ने अपने नकार-सिद्धांत द्वारा सटीक विवरण देते हैं कि बजरिये अस्मिता-सम्बन्धी चेतना और अपने शत्रु की वर्गीय सीमा के, ऐतिहासिक रूप से रक्षात्मक रहा निम्न-वर्ग सिर्फ नकार की श्रृंखला द्वारा स्वावलंबी चेतना को प्राप्त कर सकते हैं। गुहा यह तर्क देते हैं कि कैसे खेतिहर किसान अपने गुणों और विशेषताओं की बजाय या तो नकारात्मकता या फिर अपने से श्रेष्ठ की तुलना में स्वयं की कमतरी की अनुभूति द्वारा खुद की पहचान करते हैं। ‘श्रेष्ठ’ और ‘निम्न’ को गुहा ‘प्रभु-वर्ग’ और ‘अधीनस्थ’ के रूप में शब्दबद्ध करते हैं और बताते हैं कि कैसे दमन और शोषण की परंपरा अवज्ञा, चुनौती और विद्रोह के प्रति-परंपरा के विधेयरूप में सिर्फ बुरे स्वरुप में रूपाकार होते हैं जो प्रभुवर्ग-अधीनस्थ संबंध में खटास लिए परिलक्षित होती है।
‘एन इंडियन हिस्टोरिओग्राफ़ी ऑफ़ इंडिया : हेजिमनिक इम्प्लीकेशंस ऑफ़ नाईनटिंथ-सेंचुरी एजेंडा’ में गुहा स्वायत्त भारतीय इतिहासलेखन का अन्वेषण करते हुए आदर्शवादी टैगोर, आध्यात्मिक और नैतिक गाँधी और व्यवहार कुशल नेहरु के माध्यम से उन लोगों की पहचान करने का प्रयास करते हैं जो भारतीय जनता के लिए आवाज उठाये और जिसे उनके अतीत की व्याख्या-पुनर्व्याख्या का अधिकार है। इन्ही उपकरणों ने अनाधिकारिक और वैकल्पिक खांटी देशज राष्ट्रवादी इतिहासलेखन की जमीन को उर्वर बनाने हेतु हल और फावड़े का काम किया, यह अलग बात है कि ऐसे दृष्टिकोण से लिखे गए बहुतेरी रचनाओं को प्रतिबंधित किया गया। भारतीय इतिहासलेखन ने इसकी कीमत प्रतिबन्ध और दमन के रूप में चुकाई, इसलिए गुहा बीसवीं सदी के प्रारंभ में किये गए तथाकथित राष्ट्रवादी इतिहासलेखन को विफल घोषित करते हैं। कुलमिलाकर डोमिनेंस विदआउट हेजिमनी :हिस्ट्री एंड पॉवर इन कोलोनियल इंडिया शीर्षक सबाल्टर्न कृति के द्वारा रणजीत गुहा अस्मिता सम्बन्धी यह दलील प्रस्तुत करते हैं कि कैसे बिना सबाल्टर्न समूह की सहायता और सशक्त आधार के भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन सफल नहीं हो सकता था।
लब्बोलुआब यह कि, बंगाल के सभी दुर्भाग्यों और दुर्दिन का रामबाण ईलाज के तौर पर भूमि के रूप में स्थायी निजी संपत्ति की अवधारणा के आविर्भाव ने नक्सलबाड़ी आन्दोलन की जमीन तैयार की। भूमि सुधार की असफलता, युद्ध, अकाल, भूखमरी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसी समस्याओं का हल ढूँढने निकला नक्सलबाड़ी आन्दोलन राजनीति का शिकार होकर मुद्दे से भटक गया। फलस्वरूप 1972 में आंदोलन के हिंसक होने के कारण चारु माजूमदार को गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन के लिए कारावास के दौरान ही उनकी जेल में ही मौत हो गयी। बाद में, आंदोलन के राजनीति का शिकार होने के कारण और अपने मुद्दों से भटकने के कारण नक्सलबाड़ी आन्दोलन के प्रणेता कानू सान्याल ने तंग आकर 23 मार्च, 2010 को आत्महत्या कर ली।
बिना व्यापक जन-सहायता, सशक्त आधार और रणनीतिक दूरंदेशी के नक्सलबाड़ी आन्दोलन की सफलता संदिग्ध होनी ही थी। उस विफलता को समझने हेतु उस चेतना को समझना आवश्यक हो जाता है, जिसके तहत निम्न-वर्ग अपने से श्रेष्ठतर मध्यम-वर्ग और संभ्रांत-वर्ग से बिलकुल अलहदा और स्वतंत्र ढंग से अपनी राजनीति करता है। और यही ‘जनता की राजनीति एक स्वायत्त अधिकारक्षेत्र है’ की उद्घोषणा का सच भी है।