● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
एक समय था, जब हमे हाईस्कूल और इण्टरमीडिएट मे किसी एक विषय मे ‘विशेष योग्यता’ (डिसटिंक्शन) के रूप मे ७५ प्रतिशत अथवा उससे अधिक अंक प्राप्त होते थे तब हमे आज के कथित ‘टॉपरों’ जितनी प्रसन्नता होती थी और गर्व भी होता था। उन दिनो २३, २५, ३०, ३२ तथा ३५ प्रतिशत विद्यार्थी सफल होते थे। वह ऐसा समय था, जब विद्यार्थी कोचिंग, ट्यूशन इत्यादिक बन्धनो और विसंगतियों से परे रहकर अध्ययन करता था। इसका मुख्य कारण आज की अपेक्षा पहले के माता-पिता अपनी सन्तति के भविष्य के प्रति अधिक जागरूक रहते थे और उन्हें अनुशासित करते थे। इसके लिए वे स्वयं अनुशासन मे रहते थे और तन-मन-धन से उनकी सन्तति को सर्वोत्तम शिक्षा-प्रशिक्षा प्राप्त हो, इसके प्रति सजग और सन्नद्ध रहते थे। इसके अतिरिक्त तब की शिक्षक-शिक्षिकाएँ आज की तुलना मे अधिक चरित्रवान् दिखती थीं, कारण कि वे भौतिकता के पीछे भागती हुई देखी नहीं जाती थीं। सबसे बड़ी बात, तब योग्य अध्यापक-अध्यापिकाओं की नियुक्ति की जाती थी। इसका कारण तब आरक्षण का रोग जन्मा नहीं था। तब का अध्यापकवर्ग अपने योग्य विद्यार्थियों के अंकों मे कटौती कर अंक देता था।
यहाँ मै अपना ही उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ। नौवीं की वार्षिक परीक्षा मे अँगरेज़ी द्वितीय प्रश्नपत्र मे मुझे पूर्णांक ५० मे से ४८ अंक दिये गये थे और उत्तर-पुस्तिका के सबसे ऊपर ‘सन्दिग्ध’ लिख दिया गया था। जिस अध्यापक और परीक्षक ने वैसा किया था, उनका नाम श्री प्रभुनाथ शुक्ल था। वे हमे अँगरेज़ी द्वितीय प्रश्नपत्र का अध्यापन करते थे। मुझे चारों कक्षाओं मे सर्वाधिक ४८/५० अंक दिये गये थे। पहले विद्यार्थियों को सभी विषयों की उत्तरपुस्तिकाएँ दिखायी जाती थीं, ताकि उन्हें दिये गये अंकों की विधिवत् जानकारी मिल सके और वे अपने दुर्बलपक्ष को भी समझ सके।
उत्तरपुस्तिका दिखाते समय सबसे पहले मेरा नाम बुलाया गया था। उसके बाद श्रद्धेय गुरु शुक्ल जी ने कहा, “इस विद्यार्थी की कॉपी मे ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे काटकर नम्बर कम किया जा सके। इसे ‘५० मे ५०’ मिलना चाहिए; लेकिन मैने दो नम्बर काट लिये हैं। मुझे विश्वास नहीं होता कि इस विद्यार्थी ने सभी प्रश्नो के बिलकुल सही उत्तर दिये हैं।
मैने कहा, “गुरु जी! आपको यदि विश्वास नहीं होता तो आप मेरी फिर से परीक्षा ले लीजिए (‘कर लीजिए’ शुद्ध है।)। उसके बाद एक-के-बाद-एक प्रश्नो की झड़ी लग गयी :– एक्टिव-पैसिव, पार्जिंग, नरेशन, ट्रांसफ़ॉर्मेशन, लेटर-राइटिंग, एसेज, करेक्ट-इनकरेक्ट सेण्टेंस आदिक। मै भी उसी गति मे उत्तर देता रहा; कक्षा मे बैठे विद्यार्थी सन्न!
यद्यपि मै मेधावी विद्यार्थी था तथापि उक्त श्रद्धेय गुरु को विश्वास नहीं हो रहा था। अपनी इस मेधा का श्रेय अपने श्रद्धेय बाबू जी (पं० काशीनाथ पाण्डेय, एम० ए० (हिन्दी-अँगरेज़ी), एलएल० बी०) की विद्वत्ता, अध्यापन-शैली तथा उस मोटे डण्डे को जाता है, जिसे श्रद्धेय बाबू जी ज़मीन से टिकाकर खटिये के सिरहानेवाले पाये के पास अपनी पहुँच तक रखते थे। संस्कृत के रूप हों वा अँगरेज़ी-व्याकरण का कोई अध्याय, इसमें से किसी भी प्रकार की चूक होते ही शरीर पर डण्डे का बजना अपरिहार्य था।
आज-कल के अधिकतर मा-बाप रुपये कमाने मे लग गये हैं अथवा अपनी ज़िन्दगी अपनी ही तरह से जीने के लिए अभ्यस्त हो चुके हैं; दूसरी ओर, आजके अधिकतर अध्यापक धन बटोरने मे नख-शिख लगे हुए हैं। अध्ययन-अध्यापन की पद्धति इतना यान्त्रिक बना दी गयी है कि विद्यार्थी मौलिक विचार और चिन्तन करने मे समर्थ नहींं दिख रहे। जो ज़िन्दगी मे कुछ नहीं बन सके, उनमे से अधिकतर कोचिंग की दुकाने चला रहे हैं। इस कारण विद्यार्थियों का जो स्वाध्याय करने का स्वभाव था, वह समाप्त हो चुका है।
परीक्षा आयोजित करानेवाली सी० बी० एस० ई० और राज्य माध्यमिक शिक्षा परिषद् नामक संस्थाएँ अपनी गुणधर्मिता से रहित हो चुकी हैं। इनसे सम्बन्धित सभी स्कूल-कॉलेज अंक-क्रय-विक्रय करने के दुकान बन चुके हैं। इसे हम लगातार देखते आ रहे हैं। अपने प्रति आकर्षण पैदा करने के उद्देश्य से उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् ने गुणावगुण पर पदप्रहार करते हुए, अंक लुटवाने का कारख़ाना लगवा लिया है। यही कारण है कि बेहद घटिया परम्परा को जन्म देनेवाली सी० बी० एस० ई० के समानान्तर माध्यमिक शिक्षा परिषद् की भी अंक-लुटाऊ ‘बुलेट ट्रेन’ दौड़ रही है।
इन सभी पक्षों पर विचार करते समय दु:ख तब होता है जब सी० बी० एस० ई० और माध्यमिक शिक्षा परिषद् से सम्बन्धित स्कूल-कॉलेजों के जो विद्यार्थी अपने विद्यालयों (गृहपरीक्षा) मे की जा रही परीक्षाओं मे सर्वाधिक अंक प्राप्त करते हैं, वही बोर्ड परीक्षाओं मे निचले पायदान पर दिखते हैं और जो पुच्छल्ले होते हैं, वे ५०० मे ५००/४९९-४९५-४९० अंक पाते दिखते हैं। इन्हीं मे से अधिकतर जब पारदर्शितापूर्ण परीक्षाओं का सामना करते हैं तब बुरी तरह से फिसले हुए दिखते हैं।
आप ऐसे कथित टॉपरों से उनके विषय से सम्बन्धित सामान्य प्रश्न करेंगे तब उनमे से अधिकतर बग़ले झाँकते नज़र आयेंगे। ऐसे कुकृत्यों का ही परिणाम और प्रभाव है कि हमारे वे विद्यार्थी, जिन्हें वास्तव मे, कथित ‘टॉपरों’ जितना अंक मिलना चाहिए, नहीं मिलता, ‘आत्महत्या’ करते हुए दिख रहे हैं। इतना अन्याय होने के बाद भी सम्बन्धित सरकारें नक़्ली टॉपरों की पीठ ठोंकती दिखती आ रही हैं; क्या यही है, ‘शासकीय’ चरित्र?
विद्यालयों के प्रबन्धक और प्रधानाचार्य अपनी सन्तति को टॉप कराने के लिए अलग से उत्तरपुस्तिकाओं की व्यवस्था कराकर अपने यहाँ के चरित्रहीन अध्यापकों से प्रश्नो के उत्तर लिखवाते हैं; विधायक-सांसद, मन्त्री की पुत्र-पुत्रियों के लिए ‘विशेष व्यवस्था’ करायी जाती है। ये सारे कुकृत्य अयोग्यों को ‘योग्य’ साबित कराने के लिए कराये जाते आ रहे हैं; रुपये ले-देकर परीक्षा की अलग व्यवस्था करायी जाती है।
सच तो यह है कि जिस प्रकार की परीक्षण और मूल्यांकन-पद्धति बना दी गयी है, उससे सरकारें बेरोज़गारों की बेतहाशा भीड़ तैयार कराने मे लग गयी हैं। बिना सोचे-समझे अंक लुटाकर जिस संख्या मे विद्यार्थियों को उत्तीर्ण कराया जा रहा है, उनमे से कितनो के लिए सरकारी सेवाएँ उपलब्ध हैं? पहली ओर, सरकारें शासकीय सेवाओं मे लगातार कटौती करती आ रही हैं और दूसरी ओर, बेरोज़गारों की एक बस्ती बनवाती आ रही है। कल जब उन सभी को सरकारी नौकरियाँ मिलेंगी ही नहीं तब वे क्या करेंगे? ज़ाहिर है, साइबर अपराधी बनेगे; छिनैती करेंगे; अपहरण, हत्या की सुपारी लेंगे; जैसा कि आये-दिन देखने को मिल रहा है। गुनहगारलोक के सरगना बनेगे और ‘मास्टरमाइण्ड’ के रूप मे रेखांकित होते दिखेंगे।
यह एक विकट समस्या है। यदि इसका निराकरण नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं, जब देश मे हर ओर असन्तोष और आक्रोश की आग उठती नज़र आयेगी और वही बेईमान व्यवस्था लाचार, विवश तथा बाध्य दिखेगी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० जुलाई, २०२२ ईसवी।)