कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

आइए! ‘न्यूइण्डिया’ के पढ़े-लिखे नक़्लचियों से मिलें

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

नक़्लचियों को जब मौलिकता की समझ नहीं होती तब उनमें से कोई ‘बेबीनार’; कोई ‘बेबिनार’; कोई वेबिनार तो कोई वेबीनार का प्रयोग कर रहा है।

हिन्दी की तो समझ नहीं, बाबू साहिब लोग ‘रँगरेज़ी’ छाँट रहे हैं। हमारे समाचारपत्रवाले भी छापकर इस विकृति को बढ़ावा दे रहे है। इन सभी को भी एक सिरे से धिक्कार है।

आप यदि इन समाचारपत्रों के सम्पादकों से उपर्युक्त शब्दों की अर्थ और अवधारणा-विषयक प्रश्न करेंगे तो सब-के-सब बग़लें झाँकते नज़र आयेंगे। अगर विश्वास न हो तो पूछ कर देखें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २२ जून, २०२० ईसवी)