कछौना, हरदोई : आधी आबादी महिलाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय दिवस पर गोष्ठी के माध्यम से महिलाओं को बराबरी व उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मंच से बड़ी-बड़ी बातें की। पर क्या वाकई में महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए सार्थक प्रयास किया गया? शायद नहीं सरकार की दोहरी मानसिकता की सजा परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत रसोईया दर्द झेल रही है ।
वह आज भी 50 रूपए प्रतिदिन पर परिषदीय स्कूलों में कार्यरत रसोईया खाना बनाने से लेकर बर्तन धोना व स्कूल में झाड़ू लगाने को विवश है। जमीनी स्तर पर कार्यरत रसोइयों के दर्द को समझने वाला कोई नहीं है। होली का त्यौहार नजदीक होने के बावजूद भी रसोइयों को 8 माह से मानदेय नहीं मिला है। इनकी रोजी रोटी कैसे चलेगी। आखिर या परिवार का भरण पोषण कैसे करेंगे ज्यादातर रसोईया गरीब परिवार वह विधवा होती हैं ।
इतना कम पारिश्रमिक होने के बाद भी समय से ना मिलने के कारण रसोईया काफी परेशान है। उनके माथे पर चिंता की लकीरें साफ झलक रही है। वह परिवार की खुशी पूरी करने के लिए किस के आगे हाथ फैलायेगी। समाज में अपना बेहतर योगदान कर नौनिहालों को ताजा गरमा गरम भोजन कराने वाली महिलाएं सिस्टम की मार झेलने को विवश है। 50 रूपए न्यूनतम में शायद ही कोई मजदूर मिले। वही महिलाएं पूरे दिन परिश्रमिक करने को विवश है। श्रम कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। महिलाओं के अधिकारों व उनके जीवन में बदलाव की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले आखिर रसोइयों के दर्द पर क्यों मूकदर्शक बने हुए हैं। मानदेय न मिलने के कारण रसोइयों का दर्द साफ झलक रहा है। उनके त्योहार की खुशियां फीकी हो रही है। वह परिवार का सामना नहीं कर पा रही हैं।
आखिर वह अपना दर्द किससे कहें। रसोइयों को 8 माह से मानदेय न मिलने की समस्या को जय हिंद जय भारत मंच ने मुख्य विकास अधिकारी महिला आकांक्षा राणा के समक्ष रखी। हो सकता है कि सीडीओ मैडम के प्रयास से रसोइयों को होली से पहले बाकी मानदेय मिल।जाये।
रिपोर्ट – पीडी गुप्ता