उल्लू बैठा सोचता, कैसी आदम जात!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

एक–
जनता के दरबार मे, तरह-तरह के चोर।
ख़ूबी से चोरी करें, मौन बना है शोर।।
दो–
भिक्षाथाली हाथ लिये, घूम रहे चहुँ ओर।
अच्छे दिन की आस मे, भटक रही है भोर।।
तीन–
बहुरुपिये सब दिख रहे, गिरगिट बदले रंग।
शर्म-हया हैं पी रहे, दिखते नंग-धड़ंग।।
चार–
उल्लू बैठा सोचता, कैसी आदम जात!
मन की चादर मैल है, कैसे करते घात।।
पाँच–
लूट रहे हैं देश को, दे डंके की चोट।
बोल रही है सच यहाँ, मन में बैठी खोट।।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १३ जून, २०२२ ईसवी।)