बूढ़ी हुईं हाथों की लकीरें सब

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


शाम ढली दीये को जलने दो,
नींद में सपनों को पलने दो।
प्यास बढ़ती है तो बढ़ जाए,
बर्फ़ को पानी में गलने दो।
दम न तोड़ ले ख़्वाहिश कहीं,
उसको अब नींद में चलने दो।
सरे-बाज़ार शख़्स बिकता रहा,
उसे अब अपनों को छलने दो।
अँधेरों ने कब-कैसे ठगा उसे,
भोर हुई आँखें अब मलने दो।
बूढी हुईं हाथों की लकीरें सब,
भूली-बिसरी यादों को खलने दो।
पश्चात्ताप अब व्यर्थ है लगता,
कोख में पाप को फलने दो।
वक़्त को छेड़ना नादानी है,
सिर से मुसीबत को टलने दो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २२ जुलाई, २०१८ ईसवी)