विविचार विविर के विरुद्ध

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

बूढ़ी जड़―
जोड़ती आ रही है,
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को।
यत्न करो,
तुम्हारी जड़ का क्रम
ग्रन्थिल न हो।
अनुभव का विस्तार
मात्र प्रसार न बना रहे।
उसका गाम्भीर्य ओढ़ो;
परन्तु मन-भाव मे
संकुचन की पैठ न रहे।
ढूँढ़ने की आशा को
प्रत्याशा के साथ मत जोड़ो।
एक दुरभिसंधि हर पल
बाट जोहती आ रही है।
उसका हेतु दुरन्त रहा है।
समाधान और निराकरण
दुरभिग्रह-रूप मे लक्षित होते हैं।
दौर्मनस्य और दौर्जन्य
दोहित करते हैं, संस्कारों का।
प्रयत प्रयति१ प्रयात२ नहीं होते;
नैसर्गिक निष्ठा के परिणाम होते हैं।
प्रयत्नवती श्रद्धा के चरण-चुम्बन
विलक्षण प्रमेय३ सिद्ध होते हैं।
प्रशस्त४ प्रशस्ति५ मन-मस्तिष्क को
प्रशान्त६ करती अनुभव कराती है।
जड़–
अपनी प्रशाखा को प्रसन्नमुख रहकर
प्रसरण का संदेश सम्प्रेषित करती है,
जो आह्वान होता है, जीवन का―
चरैवेति-चरैवेति-चरैवेति।

शब्दार्थ :― १ पवित्र संयम २ सोचा हुआ ३ साध्य ४ श्रेष्ठ ५ प्रशंसा ६ स्थिर।

सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ अप्रैल, २०२३ ईसवी।)