नफ़्रत के ख़िलाफ़ ‘महब्बत’ का पैग़ाम

‘मुक्त मीडिया’ का आजका सम्पादकीय

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज देश मे जिस प्रकार के असमाधान की हवा चल रही है; जिस प्रकार का बीभत्स वातावरण से जन-जन को प्रभावित किया जा रहा है; देश की गरिमा को विखण्डित किया जा रहा है; संकट और संत्रास का मनोविज्ञान तैयार किया जा चुका है; आबाल वृद्ध नर-नारी के मन-प्राण को गर्हित धर्म, पन्थ, सम्प्रदाय, समुदाय, जाति-वर्ग के विषाक्त विभाजन के दंश से जर्जर किया जा चुका है; एक-दूसरे के प्रति मनभेद उत्पन्न किया जा चुका है; घृणा का परिवेश बनाकर सामाजिक दूरी उत्पन्न कर देश की जनता का बुद्धिदूषण और दोहन किया जा रहा है, उनसे देश की आन्तरिक स्थिति कितनी विध्वंसक, विभाजक तथा विद्रूप कर दी गयी है, इसके प्रति देश का उच्चस्तरीय प्रबुद्धवर्ग निश्चिन्त है; क्योंकि उसके ‘स्वर’ बिक चुके हैं और ‘लेखनी’ बन्धक बना ली गयी है; गिने-चुने जो मुक्त भाव से ‘व्यवस्था के अत्याचार, अनाचार तथा कदाचार’ का विरोध करते आये हैं, उनके स्वर को भय दिखाकर बहुत पीछे धकेल दिया जा रहा है। मेरे-जैसे कुछ दुस्साहसी भी हैं, जो “जो घर फूँको आपणो चलौ हमारे साथ”-जैसे दुर्धर्ष नाद को निनादित करते आ रहे हैं। हमारी-आपकी क्रिया पर सकारात्मक और परिणामात्मक प्रतिक्रिया करनेवाले लोकतन्त्र के रक्षक देश के प्रतिपक्षी दल के वे लोग, जो ‘राजनेता’ नामक जीव कहलाते हैं, हमारे-आपके लिए अतीव घातक सिद्ध होते आ रहे हैं। सत्ता को जीने और भोगनेवाले कथित राजनेता और सत्ता को जिलाते रहनेवाले प्रतिपक्षी राजनेता ऐसे खटमल, दीमक, मच्छर, बिच्छू तथा साँप-जैसे दिख रहे हैं, जो हमारे-आपके तन-मन-धन को खोखला करने मे सहायक सिद्ध होते आ रहे हैं; हमारे-आपके तन-मन को डँसते आ रहे हैं तथा हमारे-आपके रक्त का चूषण करते आ रहे हैं। उन्हें इस विषय के प्रति गम्भीरता बरतने की आवश्यकता नहीं पड़ती; क्योंकि वे सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि देश की जनता के साथ विश्वासघात करने के बाद भी उसे किस प्रकार से अपने आश्वासन और घोषणाओं के शब्दजाल मे फँसाया जा सकता है।

आज देश मे सर्वत्र यही स्थिति है। आप दु:ख की अवस्था मे जीवन-यापन कर रहे हैं तो उससे उन चेहरों का कोई प्रयोजन नहीं। आप अनियोजन (बेरोज़गारी) की स्थिति मे जी रहे हैं; अनेक अभाव से ग्रस्त हैं; दुरवस्था (‘दुरावस्था’ अशुद्ध है।) प्राप्त कर चुके हैं; आप आपन्न (आपद्ग्रस्त) हैं, तो होते रहें, कोई भी जनप्रतिनिधि आपका सहायक सिद्ध नहीं होगा; जैसा कि आपने अनुभव भी किया होगा।

देश की जनता छटपटा रही है। भूख से प्रतिदिन-प्रतिरात्रि देश के करोड़ों लोग ‘पेट पर तवा’ (भूख मारकर; बिना खाये-पिये) बाँधकर सो जाते हैं। आपमे से कितने जन ऐसे हैं, जिन्होंने अपने पूर्वजन्म के ‘कुकृत्य’ और ‘भाग्य’ का नाम लेकर स्वयं को कोसनेवाले लोग के साथ संवाद किया हो? यदि नहीं किया तो क्यों? यही वे लोग हैं, जो किसी धर्म, पन्थ, सम्प्रदाय, समुदाय तथा वर्ग-जाति से परे रहकर ‘रोटी और दाल’ को ही अपना इष्टदेव-देवी मानते आ रहे हैं; लेकिन उनके अतिरिक्त जितने भी लोग हैं, ‘रोटी-दाल’ छोड़कर पराये की थाली मे हाथ मारते रहे हैं; वह चाहें तनस्तर पर हो वा मनस्तर पर। सर्वाधिक घातक मन का संदूषण होता है।

आज देश मे पग-पग पर विश्वासघात और घृणा का जाल फैला दिया गया है। ऐसे मे, यदि कोई व्यक्ति एक उद्देश्य-विशेष को लेकर लगभग ४,००० किलोमीटर की दूरी पदयात्रा करके पूरी करता है और स्थान-स्थान पर मिलते लोग को कहता है :― देश मे जिस तरह की नफ़्रत फैलायी जा रही है, उससे दूर रहकर एक-दूसरे के साथ हिल-मिलकर रहो और घृणा फैलानेवालों से दूरी बना लो। उस संदेशवाहक व्यक्ति ने कहीं पर भी इस आशय का एक भी वाक्य नहीं कहा :― वर्ष २०१४ से अब तक देश मे प्रगति का कोई काम नहीं हुआ है। उस व्यक्ति ने हर जगह यही कहा, “नफ़्रत के बाज़ार मे मोहब्बत का दुकान खोल रहा हूँ।”

इससे पहले जितनी भी यात्राएँ निकाली गयी थीं, वे सभी राजनीतिक रहीं; देश को उथल-पुथल करने की रहीं; यात्रा-अभियान के गरम तवे पर ‘राजनीति की रोटियाँ’ सेंकते रहने की रही हैं; कोई वातानुकूलित बस मे बैठकर, कोई फूलों से सुसज्जित आकर्षक वाहनो मे सवार होकर, कोई राजनैतिक महामण्डलेश्वर के रूप मे जीप और रथयात्रा करता रहा; साहस होता; आत्मिक और नैतिक बल रहता तो ‘पदातिक’ (पदयात्री) बनकर दिखाते।

आत्मविश्वास के साथ तनावरहित, संकुचित-क्षुद्र स्वार्थरहित रहकर जिस मति-गति-रति के साथ वह निर्भीक युवा अपने गन्तव्य की ओर निकल आता था, राजनीति-निरपेक्ष होकर जनसमवाय एक झलक पाने के लिए उत्सुक-उतावला हो उठता था। किसी भी प्रकार की रक्षा-सुरक्षा से परे रहकर उसका शान्तिदायक पग बढ़ता रहता था; पग वहाँ अड़ जाता था जहाँ आह-संवेदनानिसृत हवा आड़े आ जाती थी; क्योंकि वहाँ ‘करुणा’ की विजय होती थी, जो उस युवा के सुदृढ़ डग को बाँध लेती थी।

“बहन! तुम लोग क्यों रो रही हो?”
“भैया! हमारे साथ ‘बलात्कार’ किया गया है।” सिसकी और फफकी मे शब्द विलीन होते रहे।
“क्या तुम उन लोग को जानती हो?”
”हाँ, हम सभी को जानती हैं।”
“उनके नाम बताओ?”
“नहीं; उनके नाम बताने से बात और बिगड़ जायेगी।”

वह व्यक्ति दु:ख-दर्द बाँटकर आगे बढ़ता रहा। मार्ग मे ‘एम्बुलेंस वाहन’ के आने-जाने पर उस यात्रा मे सम्मिलित सभी पदयात्री एक किनारे हो जाते थे और वाहन आते-जाते थे; परन्तु उस विषय को ‘पथभ्रष्ट’ मीडियातन्त्र’ के माध्यम से प्रचारित-प्रसारित नहीं कराया गया था।

शालीनता, संयम-साहस से सराबोर युवक था, राहुल गांधी, जिसका क्षुद्रजीवी ‘पप्पू’ कहकर उपहास उड़ाया करते थे। आज वही पप्पू प्रतिकूल परिस्थितियों को पराभूत करते हुए, बिना किसी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के ‘भारत-दर्शन’ कर, भारत के आत्मा से साक्षात्कार करता रहा। उसी क्रम मे उसे सूखी रोटियाँ छूँछे चबाते हुए परिवार के लोग मिले और ताज़ा रोटियाँ देशी घी मे भीतर तक भिगोकर दाल-सब्ज़ियों के साथ खानेवाले लोग भी; देश मे महँगाई, भ्रष्टाचार, रिश्वतख़ोरी से जूझता हुआ जनसमवाय दिखा और दबंगों की गुण्डई से त्रस्त समुदाय भी; राम-रहीम के नाम पर धन्धा करनेवाले लोग दिखायी दिये और व्यवस्था के अत्याचार का समर्थन करनेवाले लोग भी।

वह मानवीय यात्रा ७ सितम्बर, २०२२ ई० को तमिलनाडु-राज्य के अन्तिम छोर ‘कन्याकुमारी’ से आरम्भ होकर देश के १४ राज्यों के ७५ जनपदों मे शान्ति और प्रेम-प्रसाद का वितरण करते हुए, कश्मीर पहुँची थी।

देश के उन राजनेताओं के, जो सत्ता को अपनी चेरी मानकर अपना अधिनायकत्व (तानाशाही) प्रदर्शित करते आ रहे हैं, परिवार का एक भी ऐसा सदस्य वा (अथवा) सदस्या नहीं होगी, जिसकी देश को स्वतन्त्रता दिलाने मे किसी भी प्रकार की भूमिका रही हो; जिसकी आतंकियों की गोलियों से हत्या की गयी हो अथवा सेना मे कर्त्तव्य-निर्वहण करते हुए, वीरगति की प्राप्ति हुई हो।

ऐसे नकारे राजनेताओं को जान और समझ लेना चाहिए कि जिसका लोग कल सीना तानकर ‘पप्पू’ कहकर उपहास किया करते थे, वही ११ वर्षीय बालक जब अपने स्कूल-कक्षा मे अध्ययन कर रहा था तब एक दिन अचानक उसके पास सूचना पहुँचायी गयी थी कि उसे प्रधानाचार्य ने बुलाया है। वह बुलाने की सूचना पाकर डर गया था कि कहीं उसे कोई दण्ड न मिले; क्योंकि वह छात्र-जीवन मे बहुत उद्दण्ड स्वभाव का था। वह प्रधानाचार्य के कक्ष मे जब पहुँचा तब उसे बैठाकर प्रधानाचार्य ने बताया था :― तुम्हारी दादी (इन्दिरा जी) की हत्या कर दी गयी है। उसी तरह से राहुल जब संयुक्त राज्य अमेरिका मे थे तब उन्हें सूचना दी गयी थी :― आपके पिता (श्री राजीव गांधी) की हत्या कर दी गयी है।
अब सोचिए, उक्त दोनो ही सूचना (‘सूचनाओं और सूचनाएँ’ अशुद्ध हैं।) से बालक राहुल के मन और हृदय पर कैसी प्रतिक्रिया हुई होगी?

मोहब्बत (‘महब्बत’ शुद्ध शब्द है।) का संदेश बाँटनेवाला कभी ‘भीड़’ की कामना नहीं करता; वह महब्बत का पैग़ाम लेकर जिस दिशा मे भी निकल पड़ता है, वह दिशा मुसकरा (‘मुस्करा’ अशुद्ध है।) उठती है। उस शान्तिदूत के साथ यही होता रहा। उसके क़दम के साथ क़दम मिलाते हुए, आरम्भ से अन्त तक जो २०४ जन सहयात्री के रूप मे दिख रहे थे, उन सभी का मुखमण्डल कान्तिमान् था। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वे सभी ‘भारत के आत्मा’ के साथ संवाद करते हुए अपने गन्तव्य की ओर अग्रसथ हो रहे हों।

अग्रसर के रूप मे राहुल अपनी यात्रा की अवधि मे १३ जनसभाओं मे उपस्थित जनगणमन को सम्बोधित कर, आत्मतृप्ति का अनुभव कर रहे थे, जो मनुष्य का परम ‘हेतु’ होता है। वे नकारात्मकता की आग को सकारात्मक चेतना के शीतल जल से प्रशमित करते रहे।

अन्तत:, वह गन्तव्य भी सन्निकट दिख रहा था।

–१ डिग्री (माइनस एक डिग्री का तापमान) मे श्रीनगर के ‘लाल चौक’ पर २९ जनवरी, २०२३ ईसवी को राष्ट्रीय ध्वज को फहराते-लहराते हुए, प्रकारान्तर से दुर्दान्त आतंकियों तक सम्प्रेषित कर दिया था :― मनुष्यता से बढ़कर कुछ भी नहीं। आओ! हाथ बढ़ाओ और दनुजता का परित्याग कर, ‘मनुजता’ का पोषण करो।

१३५ दिनो के बाद शान्तिदूत का मानवीय अभियान ‘भारत जोड़ो’ का समापन देखकर प्रकृति ऐसा भाव-विभोर हो उठी थी कि उसकी प्रसन्नता के आँसू ठहरे नहीं ठहर रहे थे, फिर क्या था, प्रकृति ने धरती का शृंगार करते हुए, सर्वत्र बर्फ़ की मखमली चादर बिछाकर शान्ति-प्रेमसन्देशवाहकवृन्द का भावपूर्ण स्वागत किया था।

वह परिदृश्य इस विषय का सूचक था कि महब्बत से नफ़्रत पराजित होते ही अपना कालिमामय चेहरा छिपाकर भाग खड़ा हो चुका है और ब्रह्माण्ड मे ‘महब्बत का पैग़ाम’ विचरण करता हुआ संलक्षित होता रहा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २ फ़रवरी, २०२३ ईसवी।)
यायावरभाषक-संख्या― ९९१९०२३८७०