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प्रेमचन्द की कथा में सामाजिक यथार्थ : मत और सम्मत

प्रेमचंद के उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ आज भी जीवित है

★डॉ० प्रदीप चित्रांशी (साहित्यकार, प्रयागराज)

मुंशी प्रेमचंद ने बहुत सी कहानियाँ,उपन्यास लिखे जो आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उन्होंने वास्तविक परिस्थितियों का वर्णन जितनी वास्तविकता से किया है शायद ही किसी अन्यत्र रचनाओं में देखने को मिलती हो। यदि उनके उपन्यास की बात करें तो उनके लिखने का दृष्टिकोण व्यक्तिवादी परम्परा से ऊपर उठकर सामाजिक परम्परा,सामाजिक मुद्दे और सामाजिक वास्तविकता से संबंधित साहित्य का आगाज़ करते दिखाई देते हैं, इसीलिए उन्हें सामाजिक संवेदना का संवाहक माना जाता है।

मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यास के माध्यम से समाज को एक दृष्टि प्रदान की और यथार्थ रूप दिखाया। गोदान में ग्रामीण जीवन- संघर्ष, निर्मला में दहेज एवं बेमेल विवाह,रंग भूमि में सामाजिक एवं राजनीतिक उथल-पुथल, गबन में मध्यमवर्ग के युवकों के गिरते नैतिक मूल्यों को इन उपन्यासों के माध्यम से यथार्थ रूप में दिखाया है।

प्रेमचन्द का सामाजिक यथार्थ उनकी रचनाओं को कालजयी बनाता है

★ आरती जायसवाल (साहित्यकार, रायबरेली)
प्रेमचंद जी के ‘उपन्यासों में सामाजिक यथार्थ ‘ उनके ‘सर्जन ‘ की विशिष्ट पहचान है। समाज में उपस्थित विषमताओं,समय व परिस्थितियों की मांग अनुरूप पात्रों का चित्रण, सरलता के साथ मनुष्यों की व सामाजिक दशा का वर्णन ; उनकी रचनाओं कालजयी बनाते हैं। कुव्यवस्था पर कुठाराघात करते व बनावटी पन का उपहास उड़ाते उनके उपन्यास पाठकों को उनकी अपनी कथा से प्रतीत होते हैं।