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प्रेमचन्द के बाद धीमा होता कहानी का सफ़र, क्यों?

आज (३१ जुलाई) प्रेमचन्द की जन्मतिथि है।

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कथा-विषय पर जब संवाद-परिसंवाद होता है तब समीक्षक पारदर्शिता के साथ ‘प्रेमचन्द’ से आगे बढ़ नहीं पाता है। यह अलग बात है कि कतिपय साहित्यिक गुटों और खेमेबाज़ी के कारण गणना-प्रसंग में कुछ कहानीकार जुड़ आते हैं। अतीत और वर्तमान के विश्रुत महिला-पुरुष कहानीकारों की एक दीर्घ पंक्ति है, जो धारा-विशेष के लिए जाने जाते हैं; परन्तु जब समग्र में उनका मूल्यांकन होता है तब वे ठहर कर रह जाते हैं। ऐसे में, इस प्रश्न का साधिकार ताल ठोंकना स्वाभाविक है– आख़िर, प्रेमचन्द में ऐसी कौन-सी बात थी? उत्तर सुस्पष्ट है, हिन्दी-साहित्य की प्रवृत्तियों, विषयवस्तुओं, रूपविधानों तथा उपकरणों का अनुशीलन करने से यह ज्ञात होता है कि प्रेमचन्द का कर्तृत्व असाधारण, क्रान्तिकारी, यथार्थवादी तथा राष्ट्रवादी जीवनधारा के अधिक निकट रहा है। प्रेमचन्द के पूर्व के हिन्दी-साहित्य के अधिकतर संस्कार, आलम्बन तथा उपकरण सामन्ती सीमाओं से घिरे हुए लक्षित होते हैं। साहित्य का आलम्ब, चाहे योद्धा हो अथवा विलासी; चाहे धार्मिक हो अथवा भक्त; चाहे ईश्वर हो अथवा देवता, सभी का जीवन-व्यापार, आदर्श और मर्यादाएँ सामन्ती उच्च वर्गों के विविध स्तरों से ग्रस्त हैं। उनमें देशकाल के व्यवधान से कुछ रूपभेद हो सकते हैं; किन्तु सामान्य जनता, कृषकों तथा श्रमिकों को साहित्य का आलम्बन नहीं चुना गया था और न ही उनके जीवन-व्यापार से साहित्य में सजीवता पैदा की गयी थी। प्रेमचन्द ने युग-जीवन से प्रेरणा ग्रहण कर, सामान्य जनता और किसानों के देहाती जीवन को अपने साहित्य का आलम्ब बनाया था। उन्होंने भारत की ७० प्रतिशत जनवाणी को अपनी कहानियों के प्रमुख पात्रों से मुखरित कराया था। प्रेमचन्द-द्वारा हिन्दी-साहित्य में सामान्य राष्ट्रीय जीवन को लिए आधार बनाना, एक अभिनव और क्रान्तिकारिक प्रयोग था।

प्रेमचन्द देख रहे थे कि तत्कालीन राष्ट्रीय आन्दोलन विदेशी शासन से राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्त करने का आन्दोलन है। वर्ग में विभाजित समाज में श्रमिकों का शोषण पहले था और आज भी है। उस आन्दोलन में जो भी व्यक्ति विदेशी शासन से लोहा लेने को तैयार था, वह राष्ट्रीय आन्दोलन का एक अंग बन जाता था, तब यह नहीं देखा जाता था कि वह किस वर्ग का है :– शोषित है अथवा शोषक है। प्रेमचन्द को यह कमी खटकी थी और उन्होंने अपनी कहानियों में राष्ट्रीय आन्दोलन की झाँकियों के साथ-साथ महाजनी सभ्यता और वर्गभेदजन्य शोषण के यथार्थ चित्र भी खींचे हैं। प्रेमचन्द राजनीतिक स्वाधीनता के साथ-साथ शोषणरहित किसान-मजदूरों के ‘राज’ की भी कल्पना करते थे, इसीलिए उनकी कृतियों में ‘राष्ट्रीय एकता’ का एक बहुत बड़ा आधार वर्गहीन- शोषणहीन समाज की रचना का स्वरूप देखने को मिलता है।

प्रेमचन्द ने जिस समय साहित्यक्षेत्र में प्रवेश किया था, उस समय की साहित्य-परम्परा सामन्ती राष्ट्रीयता को अपने साथ ‘भारतेन्दु-युग’ की विरासत के रूप में ग्रहण की हुई पूँजीवादी राष्ट्रीयता के युग में प्रवेश कर रही थी। साहित्य की प्रवृत्ति, भावाधार तथा चिन्तनधारा कहीं आदर्शवादी थी तो कहीं भावप्रवण थी। आदर्शवाद पर सामन्ती राष्ट्रीयता का वर्चस्व था और भावप्रवणता की धारा पर पूँजीवादी व्यक्ति-वैचित्र्य और वैयक्तिक असन्तोष का प्रभाव था।

प्रेमचन्द अपने पूर्व और समसामयिक साहित्य-प्रवाह में अपर्याप्तता, जीवन से असम्पृक्तता तथा रूढ़ि के शिलाखण्डों को देख रहे थे, साथ ही चक्रवात की गति-सदृश बदलती हुई तत्कालीन सामाजिक चेतना और राजनीतिक जागरण के स्तर पर राष्ट्रीयता के आवरण में आच्छादित आर्थिक शोषण और वर्गभेद के साथ साक्षात् कर रहे थे, इसीलिए उन्होंने कथा-सर्जन के लिए अपना पृथक् दृष्टिकोण अपनाया था, जिसका आधार जनता का सतत प्रवाही जीवनदर्शन था, जिसमें असन्तोष की आग, रूढ़ियों और भाव-रूढ़ियों की घुटन, जातीय परम्पराओं के प्रति आस्था तथा बदलते हुए समय के नव-नूतन के प्रति कुतूहलपूर्ण जिज्ञासा होती है।

प्रेमचन्द के लेखन की सार्थकता और प्रासंगिकता इस विषय में है कि उन्होंने देश के मध्यवर्गीय चरित्र को विस्तीर्ण और वास्तविकता में दृष्टिपात करने का प्रयास किया है। जैसा कि हम जानते हैं कि भारतीय मध्य-वर्ग का चरित्र अतीव जटिल, संश्लिष्ट तथा विभाजित है। वह प्रत्येक परिवर्त्तनकारी शक्ति को सहयोग का आश्वासन देता है और पारम्परिक विचारधारा की रक्षा भी करना चाहता है। सामाजिक जीवन-यापन में वह स्वयं को उच्च-वर्ग के समीप अथवा समानान्तर रूप में देखना चाहता है; किन्तु आर्थिक विपन्नता के कारण उसका आक्रोशवर्द्धन होता रहता है। उसकी आक्रोश और क्षोभमयी मुद्रा सर्वहारा की तो हो, जबकि भोगवादी आकांक्षा उच्च-वर्ग से प्रेरित है।

कथाशिल्पी की रचनाशीलता में ‘वर्ग-संघर्ष’ अनेकश: जन्म लेता और मरता भी है। इसके बाद भी आन्दोलित मन-प्राण की क्रान्तिकारिता हर बार पाठक-वर्ग के दृष्टिपथ पर एक नयी आह और संवेदना की आड़ी-तिरछी रेखा चित्रित करती रहती है। यही वैशिष्ट्य प्रेमचन्द और उनकी सर्जनधर्मिता को प्रासंगिकता के साथ सम्पृक्त करता है।

यही कारण है कि उनकी कहानियों में मध्यवर्गीय चरित्र को अभिव्यक्त करने का श्लाघ्य प्रयास किया गया है। मध्यमवर्ग के संकटापन्न और संशयशील मनोवृत्ति की पहचान में प्रेमचन्द एकरस हो जाते हैं। आदर्श उनके लेखन का बाह्य कलेवर है और यथार्थ जीवनशक्ति। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि प्रेमचन्द-जैसा हिन्दी-कहानीकार ‘कोई’ नहीं।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३१ जुलाई, २०२१ ईसवी।)