कविता : गौरय्या
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- तू तो चटक निकली– इधर, पलकें अलसायीं उधर, तू चुग गयी दानें फिर फुर्र हो गयी ? मुझे मालूम है, तू आयेगी फिर कनखियों से ताड़ेगी मुझे अनमने से देखने का उपक्रम […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- तू तो चटक निकली– इधर, पलकें अलसायीं उधर, तू चुग गयी दानें फिर फुर्र हो गयी ? मुझे मालूम है, तू आयेगी फिर कनखियों से ताड़ेगी मुझे अनमने से देखने का उपक्रम […]