डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-

(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)मेरी गौरय्या !
तू तो चटक निकली–
इधर, पलकें अलसायीं
उधर, तू चुग गयी दानें
फिर फुर्र हो गयी ?
मुझे मालूम है,
तू आयेगी फिर
कनखियों से ताड़ेगी मुझे
अनमने से देखने का उपक्रम करेगी
अपनी अरुचि प्रदर्शित करने के लिए;
और सरकते हुए
मेरी नज़रों के उलझाव में,
लार टपकाते हुए
लक्ष्य-संधान करते हुए;
दानों को लपककर
एक बार फिर
फुर्र हो जायेगी।