'सर्जनपीठ', प्रयागराज की ओर से प्राय: नयी-नयी खोज की जाती रही है। यही कारण है कि त्याग-बलिदान से सम्पृक्त मात्र एक किशोर-वय की प्रेम-कहानी 'उसने कहा था' का प्रणयन करनेवाले चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' को 'सर्जनपीठ' की ओर से उनके जन्मदिनांक ७ जुलाई की पूर्व-संध्या मे ('पूर्व-संध्या पर' अशुद्ध है।) आयोजित राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद-कार्यक्रम मे वक्ताओँ ने भिन्न-भिन्न रूप मे प्रस्तुत किया था।
रायपुर से शिक्षाविद् प्रो० संस्कृति उपाध्याय ने बताया– वास्तव मे, गुलेरी जी मनुष्यता के पोषक थे। उन्होँने अपनी किसी रचना मे समाज के सत्याधारित आदर्श को झुठलाने की कोशिश नहीँ की है। उन्होँने सामाजिक विकृत रीति-नीति पर भरपूर कटाक्ष किया है। वस्तुत: वे एक ज़मीनी रचनाकार थे।
तेलंगाना से समीक्षक डा० आशीष क्षितिज ने कहा– चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' साहिब एक क्रान्तिकारी रचनाकार थे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-जैसे समीक्षक उनकी विद्वत्ता का लोहा मानते थे। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महामना मालवीय जी ने उन्हेँ अपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे प्राच्यविद्या-विभाग का प्राचार्य-पद ग्रहण करने के लिए आग्रह किया था, जिसे उन्होँने स्वीकार भी कर लिया था।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– आजके साहित्यकारोँ और शिक्षकोँ मे से बहुत कम को जानकारी होगी कि चन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे बी० ए० की प्रवेश-परीक्षा मे सर्वाधिक अंक अर्जित कर, तत्कालीन सारे कीर्तिमान भंग कर चुके थे। उन्होँने बी० ए० की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी ‘प्रथम’ मे उत्तीर्ण की थी। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की भी उपाधि ग्रहण करना चाहते थे; परन्तु शारीरिक अस्वस्थता के कारण चाह अधूरी रह गयी। वे एक बहुभाषाविद् थे; पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, गुजराती, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, अँगरेज़ी, जर्मन, लैटिन तथा फ्रेंच-भाषाओँ के ज्ञाता थे। उनमे साहित्य से अलग अध्यात्म, ज्योतिष, दर्शन, कला-संस्कृति, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, भाषाविज्ञान, इतिहास-पुरातत्त्व इत्यादिक विषयोँ की विशेषज्ञता भी थी।