कविता : उन्हें मालूम है
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- होठों से मुसकान उतरी कब-कैसे, उन्हें मालूम है, चेहरे पे कालिख़ पुती कब-कैसे, उन्हें मालूम है | चाहत शर्मिन्दा बन गयी और वे तमाशाई रहे, तिनका-मानिन्द ख़्वाब बिखरा कैसे, उन्हें मालूम है […]
डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय- होठों से मुसकान उतरी कब-कैसे, उन्हें मालूम है, चेहरे पे कालिख़ पुती कब-कैसे, उन्हें मालूम है | चाहत शर्मिन्दा बन गयी और वे तमाशाई रहे, तिनका-मानिन्द ख़्वाब बिखरा कैसे, उन्हें मालूम है […]