स्वाधीनता का अर्थ और देशभक्ति का दिखावा

जैसे-जैसे 15 अगस्त निकट आता है, देशभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन भी तेज हो जाता है। तिरंगे हाथों में दिखाई देने लगते हैं, रैलियाँ निकलती हैं, देशभक्ति के नारे गूंजते हैं और सोशल मीडिया राष्ट्रप्रेम के संदेशों से भर जाता है। यह दृश्य पहली दृष्टि में उत्साह और गौरव से भरने वाला लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपे कुछ सवाल हमें ठहरकर सोचने के लिए विवश करते हैं। क्या देशभक्ति केवल तिरंगा उठाने, नारे लगाने और रैली निकालने तक सीमित रह गयी है? क्या स्वतंत्रता दिवस केवल एक वार्षिक उत्सव बनकर रह गया है, जिसका हमारे सामाजिक और नैतिक जीवन से कोई गहरा संबंध नहीं बचा?

विडंबना यह है कि जो लोग वर्ष भर अपने आचरण से समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के लिए मुश्किलें खड़ी करते हैं, वे भी 15 अगस्त आते ही देशभक्ति के सबसे मुखर चेहरों में शामिल हो जाते हैं। आज जो तिरंगा लेकर रैली निकाल रहा है, यदि वही कल किसी मजलूम को उसके अधिकार, सम्मान या घर से वंचित करने में सहभागी बन जाए, तो उसकी देशभक्ति पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। राष्ट्रप्रेम का वास्तविक अर्थ केवल राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि उस राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक के सम्मान, अधिकार और स्वतंत्रता की रक्षा करना भी है।

एक समय था जब स्वतंत्रता दिवस में राजनीतिक प्रदर्शन कम और भावनात्मक जुड़ाव अधिक दिखाई देता था। तब यह दिन उन लोगों को स्मरण करने का अवसर था जिन्होंने अपने जीवन, परिवार और सुख-सुविधाओं का त्याग कर देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। स्वतंत्रता केवल सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं थी; वह एक ऐसे समाज का सपना थी जिसमें अन्याय, शोषण और भय से मुक्ति हो और प्रत्येक व्यक्ति गरिमा के साथ जीवन जी सके।

आज प्रश्न यह है कि उस स्वप्न का क्या हुआ?

राष्ट्रगान के दौरान कुछ क्षण सावधान की मुद्रा में खड़ा होना भी यदि हमारे लिए कठिन हो गया है, तो हमें यह समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति के प्रतीकों और उसके मूल्यों के बीच कितना अंतर पैदा हो चुका है। दूसरी ओर, जिन क्रांतिकारियों ने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया, उनके संघर्ष को संकीर्ण राजनीतिक दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति भी चिंताजनक है। जिन लोगों ने स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया, उनके योगदान को सम्मान देने के बजाय उन्हें सुविधानुसार परिभाषित करना इतिहास और राष्ट्र दोनों के साथ अन्याय है।

लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं है। गणतंत्र का अर्थ केवल परेड, सलामी और सरकारी समारोह भी नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक कसौटी यह है कि सत्ता से बाहर खड़ा एक सामान्य नागरिक कितना सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र है। यदि गरीब अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने को विवश है, कमजोर व्यक्ति न्याय के लिए दर-दर भटकता है और प्रभावशाली व्यक्ति कानून तथा व्यवस्था को अपने हित में मोड़ने में सफल हो जाता है, तो हमें अपने लोकतंत्र की आत्मा पर विचार करना चाहिए।

आज अनेक बार ऐसा प्रतीत होता है कि गणतंत्र की जगह ‘गन-तंत्र’ और जनतंत्र की जगह शक्ति-तंत्र प्रभावी होता जा रहा है। सत्ता, धन और प्रभाव का गठजोड़ यदि नागरिक की आवाज से बड़ा हो जाए, तो स्वतंत्रता का अर्थ धीरे-धीरे खोखला होने लगता है। राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब सामाजिक और आर्थिक न्याय भी उसके साथ आगे बढ़े।

स्वाधीन भारत में यदि नागरिक स्वयं को भय, असमानता, अन्याय और दबाव के बीच पराधीन महसूस करने लगे, तो स्वतंत्रता की उपलब्धि पर आत्ममंथन आवश्यक है। स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस भारत की कल्पना की थी, वह केवल विदेशी शासन से मुक्त भारत नहीं था; वह अन्याय से मुक्त, गरिमापूर्ण और मानवीय भारत था। इसलिए 15 अगस्त का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमने कितनी बड़ी रैली निकाली, कितने झंडे लगाए या कितने देशभक्ति के नारे लगाए। असली प्रश्न यह होना चाहिए कि हमने अपने आसपास के मनुष्य की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए क्या किया।

देशभक्ति प्रदर्शन नहीं, जिम्मेदारी है। तिरंगा केवल हाथ में उठाने की वस्तु नहीं, बल्कि उन मूल्यों का प्रतीक है जिनके लिए अनगिनत लोगों ने बलिदान दिया। यदि हम उन मूल्यों की रक्षा नहीं कर सकते, तो हमारे उत्सव अधूरे हैं। स्वतंत्रता दिवस हमें केवल अतीत का गौरव याद कराने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान की कमियों का आईना दिखाने के लिए भी आता है। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल सत्ता, समारोह और दिखावे तक सीमित रह जाए, तो उस स्वतंत्रता के औचित्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

इसलिए इस बार 15 अगस्त पर तिरंगा अवश्य फहराएँ, राष्ट्रगान अवश्य गाएँ और स्वतंत्रता सेनानियों को अवश्य याद करें—लेकिन साथ ही अपने भीतर यह सवाल भी उठाएँ कि क्या हमारे व्यवहार में उस स्वतंत्रता की झलक है, जिसके लिए यह देश स्वतंत्र हुआ था। यदि स्वतंत्रता का अर्थ केवल इतना ही रह जाना है कि हम दूसरों की स्वतंत्रता छीनकर अपनी स्वतंत्रता का उत्सव मनाएँ, तो फिर यह उत्सव किसके लिए है?

स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह हर नागरिक की हो—केवल शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों की नहीं।