आप भारतीय साहित्य से सिनेमा तक, विश्विद्यालय से लेकर तथाकथित बुद्धिजीवियों के विमर्श तक देखिए कि हमारी परंपराओं का, हमारी सभ्यता का, भारतीय पहनावे का, चोटी का, जनेऊ का, धोती का, साड़ी का, हिंदी का, हिंदुस्तान का— —किस तरह उपहास किया जाता रहा है। वामपंथी इस देश को ‘गाय-गोबर का देश’ कहते रहे और विदेशी ‘सपेरों’ और चरवाहों का। ऐसा कृत्रिम आवरण हमारे चारों ओर सप्रयास बनाया गया कि जो कुछ अच्छा है हमारे पास, वह मुगल लाये। जो कुछ आविष्कार हुआ, वह पश्चिमी देशों ने किया। जो प्रौद्योगिकी, तकनीक हम प्रयोग कर रहेहैं, वह सारी अमरीका की है। जो सस्ता है, वह चीन का है। गोया कि हम भारतीयों का जीवन तो खाने, हगने और संतति बढ़ाने में ही बीत गया।
डॉ. पवन विजय की नवीनतम पुस्तक ‘जीरो’ कोई खोज नहीं करती, किसी आविष्कार का दावा नहीं करती। बस जो प्रतिभा, ज्ञान, मेधा हमारे पास सदियों से थी, उसे तथ्यों और तर्कों के साथ पुस्तक के रूप में परोस दिया है।
महान गणितज्ञ आर्यभट्ट की खोज ‘जीरो’ गणित ही नहीं सम्पूर्ण विज्ञान के क्षेत्र में विश्व को भारत का एक बड़ा अवदान है। लेकिन उनके ही द्वारा ‘बीजगणित’ और ‘दशमलव प्रणाली’ की खोज भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा संगीत के जनक माने जाने वाले हमारे वेद – सामवेद, सुश्रुत की शल्य चिकित्सा, ब्रह्मगुप्त द्वारा ‘ऋणात्मक संख्याओं के नियमों का स्पष्ट वर्णन’ , महर्षि पतंजलि का ‘योग’, वाराहमिहिर का ‘प्रकाश कण सिद्धांत’ और मौसम तथा भूकंप संबंधी विज्ञान, भास्कराचार्य द्वितीय का ‘चक्रवाल सिद्धांत’ तथा ‘भास्कर चक्र, कणाद का ‘गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत’, आचार्य पिंगल द्वारा ‘बाइनरी संख्या’ भी महत्वपूर्ण खोजे हैं। जिनसे आम भारतीय लगभग अनजान हैं।
इसके बाद के वर्षों में भी भारत भूमि के महान गणितज्ञ रामानुज ने ‘हार्डी -रामानुजन संख्या’ के साथ ही दुनिया को ‘मॉक थीटा फंक्शन’, पाई का मान, संख्या सिद्धांत, विभाजन सूत्र भी प्रदान किया। प्रो. जगदीश चंद्र बोस द्वारा ‘बेतार के तार’ और ‘केस्कोग्राफ’ की खोज, सत्येंद्र नाथ बोस द्वारा ‘क्वांटम सांख्यिकी’, प्रो. सी. वी. रमन का ‘प्रकाश प्रकीर्णन सिद्धांत’, सुब्रमण्यम चंद्रशेखर का ‘मॉस लिमिट ऑफ व्हाइट ड्वार्फ’, प्रो. हरगोविंद खुराना का ‘अनुवांशिक कोड’ भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण खोजें हैं।
आजादी के पश्चात श्री नरिंदर सिंह कापनी द्वारा ‘ऑप्टिकल फाइबर’ का आविष्कार, अजय भट्ट द्वारा ‘यूसबी’, अमर बोस द्वारा ‘नॉइज़ कैंसलेशन हेडफोन’, शिवा अयादुराई द्वारा ‘ई-मेल’, विनोद धाम की ‘फ़्लैश मेमोरी टेक्नोलॉजी’, कृष्णा भारत द्वारा ‘ऑटोमेटेड न्यूज़ सर्विस’, नितेश कुमार जांगिड़ द्वारा ‘नियोनेटल ब्रीथिंग डिवाइस, राज रेड्डी द्वारा ‘कॉन्टिनुअस स्पीच रिकॉगनिशन सिस्टम’ भी आधुनिक विश्व को भारतवंशियों द्वारा प्रदत्त बड़े उपहार हैं।
डॉ. पवन विजय की यह पुस्तक तमाम खगोलीय, अभिलेखीय, पुरातात्विक और साहित्यिक प्रमाणों से यह सिद्ध करती है कि महाभारत युद्ध एक वास्तविक घटना है, कोई कपोल कल्पित कथा नहीं। यह भी कि सिंधु घाटी सभ्यता ‘उत्तर महाभारत कालीन’ सभ्यता है। सीवेज सिस्टम और फ्लश सिस्टम हड़प्पा और सिंधु घाटी कालीन व्यवस्था हैं। प्रयागराज के श्रृंगबेरपुर में उन्नत जल शोधन प्रणाली के अवशेष मिले हैं। महरौली में स्थित स्तंभ का जंग रहित लोहा, दक्षिण भारत की वुर्टज स्टील भी हमारी ही खोज हैं।
इसके अतिरिक्त पकाकर भोजन करना सर्वप्रथम भारत में शुरू हुआ। मालपुआ, लड्डू, पहला प्रोसेस्ड फ़ूड माने जानी वाली सेंवई, सिखरन, करम्भा, पुरोदाश जैसे व्यंजन भारत ने विश्व को सप्रेम भेंट किये। ‘छप्पन भोग’ की संकल्पना केवल हमारे यहां ही संभव थी। बॉल, डाइस, कुश्ती, चेस, दौड़, लूडो जैसे खेल और मार्शल आर्ट (कलारिपिट्टू) जैसे युद्ध कौशल इसी पावन भूमि से संसार भर ने सीखे। इत्र की खुशबू हमने ही चारों दिशाओं में फैलाई। ‘दर्शन’ और ‘कर्म का सिद्धांत’ भी हमने ही विश्व को पढ़ाया। धरती का मानचित्र, खगोल विज्ञान, ग्रहों का व्यास भी हमने प्राचीन काल में ही काफी हद तक सटीक निकाल लिया था।
यह पुस्तक विश्व के दो कोनों में श्रद्धा के प्रतीक उत्सवों ‘नील नदी उत्सव’ और ‘छठ पूजा’ में तमाम साम्य स्थापित करती है। यह साम्य यह भी बताता है कि हमारे ज्ञान का ही नहीं, संस्कृति औऱ सभ्यता का विस्तार भी विश्व भर में हुआ है। ‘भारत विभाजक शक्तियों’ द्वारा फैलाये जा रहे एक बड़े नैरेटिव को यह पुस्तक वैज्ञानिक तर्क का हवाला देते हुए ध्वस्त करती है। पुस्तक बताती है कि आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है। इसलिए आर्य और द्रविड़ विवाद व्यर्थ है। इस देश में रहने वाले सभी धर्म, जाति के 99% लोग ‘मूल निवासी’ हैं।
‘जीरो पुस्तक’ दो बिल्कुल नवीन संभावनाओं पर तथ्यों के आधार पर देश भर के सामाजिक विज्ञानियों और इतिहासकारों से पुनः विचार करने का आग्रह करती है:-
1.अंग्रेज भूवैज्ञानिक फिलिप स्कालेटर के सिद्धान्त के अनुसार आदि मानव की उत्पत्ति अफ्रीका के बजाय ‘कुमारी कंदम’ (मेडागास्कर) से हो सकती है। लीमर बंदर के जीवाश्म इस क्षेत्र (लेमुरिया) में प्राप्त हुए हैं, जबकि अफ्रीका में नहीं मिले।
- दिलमुन को आमतौर पर बहरीन माना जाता है। लेकिन मेलुहा की तरह दिलमुन भी भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र अथवा सिंधु सभ्यता से जुड़ी हो सकती है। क्रेमर की पुस्तक, सुमेरी कथा के अंत मे ‘सूर्योदय वाले देश’ का वर्णन, सुमेरी साहित्य में ‘देवदार प्रदेश’ का उल्लेख इस संभावना को बल प्रदान करते हैं।
यह तो स्थापित सच है कि गुलामी, सफलता का सारा क्रेडिट खा जाती है। मुगल और अंग्रेज आक्रांता थे, वे हमारी उपलब्धियों को सिरे से नकार दें, सारा क्रेडिट खुद ले लें, यह तो समझ आता है। लेकिन स्वतंत्रता के बाद भी ‘किन्हीं कारणों’ से शिक्षा व्यवस्था का ताना बाना कुछ इस तरह से बुना गया कि हमारे अंदर अपने इतिहास को पढ़कर गर्व होने के बजाय हीनभावना, कमतर होने का भाव भर जाए। गोया कि हम गुलाम होने योग्य ही थे। गोया कि हम जब भी लड़े, केवल हारे। मानो कि हमारे पास सुई से जहाज तक, संगीत से लेकर नृत्य तक और व्यंजनों से लेकर पाककला तक जो भी अच्छा है, सब आयातित है, सब उधार का है।
‘जीरो’ पुस्तक जम्बो द्वीप भारत खंड के सभी सनातनियों को याद दिलाती है, स्मरण कराती है कि हम उन प्रतापी पुरुषों , महान मनीषियों, विद्वान वैज्ञानिकों और कुशल कारीगरों के वंशज हैं जिनकी खोजों, आविष्कार और ज्ञान ने पूरे विश्व के मानव मात्र का कल्याण किया है। बिना किसी स्वार्थ और कॉपीराइट की कामना के। ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से। सम्पूर्ण विश्व को वृहद परिवार, अपना भाई-बंधु मानकर।
वस्तुतः हम सभी भारतीयों के लिए विशेषकर जेन जी के लिए ‘जीरो’ पुस्तक ‘जामवंत’ जैसी है। यह अनूठी पुस्तक गुणवान, कलावान, विद्वान और बलवान सभी ‘भारतीय बजरंगियों’ से “का चुप साधि रहा बलवाना” का ओजपूर्ण आह्वान करती है। ‘जीरो’ उन्हें उनकी मेधा, कौशल और पराक्रम याद दिलाती है तथा अपनी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य पर गर्व करना सिखाती है। उन्हें भरोसा दिलाती है कि वे आज भी पूरी दुनिया अपनी मुट्ठी में कर सकते हैं, पुनः विश्व गुरु बन सकते हैं।
उक्त तमाम कारणों से यह पुस्तक अवश्य ही पढ़ी जानी चाहिए, रखी जानी चाहिए। इस पर चर्चा की जानी चाहिए। ‘जीरो’ हमारे विमर्श का विषय बननी चाहिए।
–विनय सिंह बैस