निराला को ‘खड़ी बोली’ का पाठ पढ़ाया था, मनोहरा देवी ने

निराला के जन्मदिनांक (२१ फ़रवरी) पर विशेष प्रस्तुति

प्रयागराज। प्राय: देखा गया है कि पति को सन्मार्ग पर चलने के लिए पत्नी ही प्रेरित करती आयी है और उस पथ पर चलते हुए, वह पति एक दिन ‘महापुरुष’ के रूप मे सुख्यात हो जाता है। इस तरह के अनेक उदाहरण हैँ– कालिदास, तुलसीदास। हम यहाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ को भी उसी पंक्ति मे स्थान दे सकते हैँ।

इस तथ्य की पुष्टि करते हुए, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने एक संस्मरण का उल्लेख करते हुए बताया है, जिससे सुस्पष्ट हो जाता है कि दारागंज, इलाहाबाद मे निवास करनेवाले अक्खड़ और यथार्थवादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ को हिन्दी-खड़ी बोली का ज्ञान करानेवाली उनकी सुसंस्कृत और विदुषी पत्नी मनोहरा देवी ही थीँ, जिनका समादर करते हुए, निराला ने एक विद्यार्थी के रूप मे हिन्दी-भाषा की समझ विकसित की थी; क्योँकि बंगाल-निवासी निराला की मातृभाषा बांग्ला थी और मनोहरा देवी की हिन्दी; क्योँकि वे रायबरेली की थीँ।

आचार्य ने बताया– एक बार की बात है, जब मनोहरा देवी निराला को हिन्दी सिखाने के क्रम मे उन्हेँ कई बार टोकती रहीँ तब अपने हिन्दी-अज्ञान के कारण हीन भावना से ग्रस्त निराला फट पड़े थे– जब देखो तब तुम हिन्दी का लट्ठ लेकर मेरे पीछे पड़ी रहती हो। आख़िर तुम्हारी हिन्दी मे है क्या? इसपर मनोहरा देवी ने प्रतिक्रिया करते हुए कहा था– जब तुम्हेँ हिन्दी आती ही नहीँ तब कुछ भी नहीँ है। इसपर प्रश्नात्मक स्वर मे निराला बोल पड़े– मुझे हिन्दी नहीँ आती? मनोहरा ने उस प्रश्न को लपकते हुए कहा था– यह तो तुम्हारी ज़ुबान ही बतलाती है। बैसवाड़ी बोल लेते हो; तुलसी की रामायण पढ़ी है, बस। तुम खड़ी बोली क्या जानते हो? निराला ने चुप रहने मे ही अपनी भलाई समझी थी; क्योँकि वास्तव मे उन्हेँ खड़ी बोली की समझ नहीँ थी।

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने आगे बताया– निराला को अपने जीवन मे अर्द्धांगिनी मनोहरा देवी के वैदुष्य के अभाव का अनुभव तब हुआ था, जब वे चिर-निद्रा मे विलीन हो गयी थीँ। अन्तत:, निराला के शब्द फूट पड़े थे– जिसकी मैत्री की दृष्टि क्षणमात्र मे मेरी रुक्षता को देखकर मुस्कुरा देती थी; जिसने अन्त मे अदृश्य होकर मुझसे मेरी पूर्ण परणीता की तरह मिलकर, मेरे जड़ हाथ को चेतन हाथ से उठाकर दिव्य शृंगार की पूर्ति की, वह सुदक्षिणा प्रिया प्रकृति दिव्य धामवासिनी हो गयी।

घोर हठधर्मी होते हुए भी निराला ने अपनी भार्या मनोहरा देवी के वैशिष्ट्य को स्वीकार किया था, अपनी रचना की इन पंक्तियोँ के माध्यम से– “रँग गई पग-पग धन्य धरा,
हुई जगमग मनोहरा।”
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