“भए प्रगट कृपाला, दीनदयाला” का भाषिक अर्थ, अवधारणा एवं संदर्भ

शब्दसंधान

हमने यहाँ श्री राम के जन्म से सम्बन्धित गोस्वामी तुलसीदास-विरचित कृति "भये प्रगट कृपाला, दीनदयाला....." की भाषिक मीमांसा की है। चूँकि 'श्री रामनवमी' का वातावरण है अत: हम अपनी दुर्लभ 'आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय की भाषा की पाठशाला' मे चलते हैँ और व्याकरण एवं भाषाविज्ञान के निकष पर प्रत्येक शब्द का परीक्षण करते हैँ।

तो आइए! हम अब प्रत्येक शब्द के अर्थगौरव से परिचित हो लेँ।

शब्द हैँ :– श्री रामनवमी, भए, प्रगट, कृपाला तथा दीनदयाला।

‘श्री रामनवमी’ के संदर्भ मे “भये प्रगट कृपाला दीनदयाला” मे भये, प्रगट, कृपाला तथा दीनदयाला शब्दों की सार्थकता केवल भक्तिभाव-स्तर पर सार्थक लक्षित हो रही हैं; परन्तु शुद्धता की दृष्टि से इन पर प्रश्नचिह्न लगता दिख रहा है। हमने अपनी पाठशाला मे अपने पाठक-पाठिका-वर्ग को इन शब्दों के शुद्ध रूप से अवगत कराया है।

तो आइए! उन शब्दों को समझते हैं।

श्री रामनवमी :– यहाँ तीन शब्द हैँ :– श्री, राम और नवमी, जिनसे जुड़कर ‘श्री रामनवमी’ की रचना होती है। यदि हम ‘श्रीराम’ लिखेँगे तो हमारा लेखन अशुद्ध हो जायेगा; क्योँकि उनका मूल नाम ‘राम’ था; उनका समादर करने की दृष्टि से उनके नाम के पूर्व ‘श्री’ का प्रयोग किया जाता है; इसप्रकार से– श्री राम। जैसे हम अपने माता-पिता के नाम से पू्र्व आदरसूचक शब्द ‘श्री’ का प्रयोग उनके मूल नाम से थोड़ा हटकर करते हैँ; इसप्रकार से– श्री अल्पना और श्री आत्माराम।

अब हम पहले ‘श्री’ शब्द को समझेँगे।

श्री :– यह संस्कृत-भाषा से उत्पन्न शब्द है, जो कि शब्दभेद के विचार से संज्ञा-शब्द है तथा लिंग-दृष्टि से स्त्रीलिंग-शब्द।
अब ‘श्री’ शब्द की रचना-प्रक्रिया समझेँ। यह ‘श्रि’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘सेवा करना’ है। इस धातु के अन्त मे जैसे ही ‘क्विप्’ प्रत्यय जुड़ता है वैसे ही ‘श्री’ शब्द की उत्पत्ति होती है। ‘श्री’ का प्रचलित अर्थ ‘लक्ष्मी’ है, जो ‘ऐश्वर्य’ और ‘वैभव’ का सूचक है।

आदरसूचक शब्द, जो नाम के आरम्भ मे रहता है, ‘श्री’ कहलाता है। उदाहरण के लिए– श्री कृष्णकान्त। समाज का एक वर्ग, जो अपने नाम के आगे एकाधिक ‘श्री’ का व्यवहार करता आ रहा है, वह अनुचित, निरर्थक तथा हास्यास्पद है। प्रतिष्ठापूर्ण उपाधि के लिए एक ‘श्री’ ही पर्याप्त है।

‘श्री’ ऐसा वैभवबोधक शब्द है, जिसका प्रयोग महिलाएँ भी कर सकती हैँ। यदि कोई यह तर्क प्रस्तुत करता है कि विवाहिता (‘विवाहिता महिला’ अशुद्ध है।) के लिए केवल ‘श्रीमती’ का प्रयोग किया जाना चाहिए तो उनसे प्रश्न है– ‘श्रीमती’ शब्द का ऐसा कौन-सा अर्थ है, जिससे ‘विवाहिता’ होने की पुष्टि होती है? वास्तव मे, ‘श्री’ शब्द उभयलिंगी है; जैसे– श्री दुर्गा, श्री लक्ष्मी, श्री सीता इत्यादिक। यह ‘श्रीमान्’ शब्द का स्त्रीलिंग-रूप है।

अब हम ‘राम’ शब्द पर विचार करेंगे।

राम :– ‘राम’ मे दिख रहे दो शब्दोँ ‘रा’ और ‘म’ के भिन्न-भिन्न अर्थ हैँ, जो राम का माहात्म्य (‘महात्म’, ‘महात्म्य’ और ‘माहात्म’ अशुद्ध हैँ।) सिद्ध करते लक्षित होते हैँ। यदि हम दृष्टि मे वस्तुपरकता लायेँ तो हमे राम के भिन्न-भिन्न कल्याणयुक्त अर्थ दिखते हैँ। ‘रा’ का अर्थ ‘आभा’/ ‘प्रकाश’ और ‘म’ का अर्थ ‘मेरा’ है; अर्थात् ‘मेरा प्रकाश’, ‘मेरे भीतर का प्रकाश’ अथवा ‘मेरे हृदय का प्रकाश’ ‘राम’ है। एक अन्य ‘राम’ को समझेँ। ‘रा’ का अर्थ ‘विश्व’ और ‘म’ का ‘ईश्वर’ है। इससे ‘राम’ का अर्थ ‘विश्वेश्वर’ (विश्व के ईश्वर) है। अब इस राम मे ‘रा’ का अर्थ ‘लक्ष्मी’ और ‘म’ का ‘ईश्वर’ है। इसप्रकार ‘राम’ का अर्थ हुआ, ‘लक्ष्मी के ईश्वर’ (लक्ष्मीपति अर्थात् विष्णु)। राम’ मे दो शब्द हैँ और चार वर्ण। र्+आ+म्+अ इनका योग ‘राम’ है। ‘र’, ‘आ’ तथा ‘म’ के योग से ‘राम’ नामक मन्त्र की उत्पत्ति होती है। यही ‘राम’ रसायन है, तभी तो तुलसीदास कहते हैं, “राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।।” इस राम मे ‘र’ अग्नि का बोध कराता है :– ‘आ’ बीजमन्त्र का और ‘म’ ज्ञान का।

‘राम ‘रम्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘रमण करना’ है। इस धातु के अन्त मे ‘घञ्’ प्रत्यय के योग से ‘राम’ शब्द का सर्जन होता है। जो कण-कण मे रमण करता है, वह ‘राम’ कहलाता है। “रमते कणे-कणे इति राम:”।

हमने अब तक ‘श्रीराम’ शब्द को समझ लिया है। हम अब ‘नवमी’ शब्द का बोध करेंगे।

नवमी :– ‘नवमी’ शब्द की उत्पत्ति को समझने से पूर्व हमे ‘नवम’ (‘नवम्’ शब्द अशुद्ध है।) शब्द का बोध करना होगा, जिसकी उत्पत्ति संस्कृत-भाषा के शब्द ‘नवन्’ से होती है। ‘नवन्’ शब्द मे ‘डट्’ और ‘मट्’ प्रत्ययोँ के योग से ‘नवम’ शब्द की रचना होती है। यह शब्दभेद के विचार से संज्ञा-शब्द है तथा लिंग-दृष्टि से पुंल्लिंग-शब्द, जिसका स्त्रीलिंग-शब्द ‘नवमी’ है। ‘नवम’ के अर्थ हैँ :– जो गणना मे नौ के स्थान पर हो, नौ की संख्या इत्यादिक।

‘नवम’ के स्त्रीलिंग-रूप ‘नवमी’ की परिभाषा है :– किसी पक्ष की नौवीँ (‘नवीं’ अशुद्ध है।) तिथि ‘नवमी’ कहलाती है। चन्द्रमा की नौवीँ कला का समय भी ‘नवमी’ है। इस ‘नवमी’ को ‘नौमी’ भी कहते हैँ, जो कि शब्दभेद के विचार से संज्ञा का शब्द है तथा लिंग-दृष्टि से स्त्रीलिंग का। गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी एक चौपाई मे ‘नौमी’ का कितना मनोरम प्रयोग किया है, “नौमी तिथि मधुमास पुनीता।” ग्राम्यांचल मे ‘नवमी’ को ‘नाउमी’ भी कहा जाता है।

एक अन्य शब्द ‘नौमि’ भी है, जो कि शब्दभेद के विचार से सकर्मक क्रिया है, जिसका अर्थ है, ‘नमस्कार करता हूँ।’

भए :– यह अवधी-बोली है, जो कि शब्दभेद के विचार से क्रिया-शब्द है और लिंग-दृष्टि से पुंल्लिंग-शब्द, जिसके तीन वचन हैँ :– भया (एकवचन; पुंल्लिंग), भई (एकवचन; स्त्रीलिंग) भये (बहुवचन; पुंल्लिंग)। इनके क्रमश: अर्थ हैँ :– हुआ, हुई तथा हुए।

यदि किसी ने इन क्रियात्मक शब्दोँ का सर्वाधिक प्रयोग किया है तो वे हैँ, कबीरदास।

‘भया’, ‘भये’ और ‘भई’ का एक प्रयोग देखेँ–
● “सिद्ध भया तो क्या भया, किये न जग उपकार।”
● “कबीर कब से भये बैरागी।”
सूरदास कहते हैँ,
● “साँझ भई घर आवहु प्यारे।’

प्रगट :– ‘प्रकट’ शब्द का तद्भव रूप ‘प्रगट’ है। ये दोनो ही शब्द शब्द-भेद के विचार से विशेषण के शब्द हैँ।

‘प्रकट’ ‘कट्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ है, ‘समीप आना’। इसके पूर्व मे ‘उत्तम ढंग से’ के अर्थ मे ‘प्र’ उपसर्ग लगा हुआ है और पश्चात् मे ‘अच्’ प्रत्यय जुड़ा हुआ है, जिससे कि ‘प्रकट’ शब्द की उत्पत्ति होती है।

इसके समानार्थी शब्द हैँ :– उत्पन्न, अवतरित, आविर्भूत इत्यादिक। इसके अन्य अर्थ हैँ :– व्यक्त; स्पष्ट आदिक।
जब कोई प्रकट होता है तब अत्यन्त समीप से दिखायी देता है, जो कि ‘कट्’ धातु के प्रयोग का प्रभाव है। हम ‘निकट’, ‘विकट’, ‘संकट’ इत्यादिक शब्दों मे भी उक्त धातु और प्रत्यय का प्रयोग करेँगे, जिसके अर्थ मे परिवर्त्तन शब्दोँ के पूर्व मे युक्त उपसर्ग के अर्थ करेँगे।

यही अर्थ और अवधारणा ‘प्रगट’ के लिए भी लागू होती है।

कृपाला :– ‘कृपालु’ शब्द शुद्ध है, ‘कृपाला’ नहीँ; क्योँकि इस पर अवध-क्षेत्र की बोली का प्रभाव दिख रहा है, जिसे तोड़-मरोड़कर आंचलिक प्रयोग के साथ जोड़ दिया जाता है और लोक-व्यवहार के साथ वह प्रचलन मे आ जाता है।

वास्तव मे, ‘कृपालु’ शब्द की रचना ‘कृपा’ शब्द से होती है, जो कि शब्दभेद के विचार से संज्ञा का शब्द है और लिंग-दृष्टि से पुंल्लिंग-शब्द। ‘कृपा’ ‘कृप्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘कल्पना करना’ है, जिसमे ‘अङ्’ और ‘टाप्’ प्रत्ययोँ के जुड़ने से ‘कृपा’ शब्द की रचना होती है।

‘कृपा’ के समानार्थी शब्द हैँ :– अनुकम्पा, अनुग्रह, दया इत्यादिक। निस्स्वार्थ (‘नि:स्वार्थ’ और ‘निस्वार्थ’ अशुद्ध हैँ।) भाव से अन्य की भलाई करना, ‘कृपा’ है।

‘कृपालु’ शब्दभेद के विचार से विशेषण का शब्द है। ‘कृपा’ मे ‘आदान’ के अर्थ मे ‘ला’ धातु का शब्द है। जो सब पर कृपा करे, वह ‘कृपालु’ है। इसके समानार्थी शब्द हैँ :– दयालु, अनुग्राहक, अनुग्रह करनेवाला, कृपा करनेवाला इत्यादिक।

दीनदयाला– ‘दीनदयाला’ शुद्ध शब्द नहीँ है; शुद्ध शब्द ‘दीनदयालु’ है, जिसका शाब्दिक अर्थ है :– ग़रीबोँ के प्रति दयालु और दीनो पर दया करनेवाला।

इसमे दो शब्द हैँ :– ‘दीन’ और ‘दयालु’। हम पहले ‘दीन’ शब्द पर विचार करेँगे।

दीन :– यह शब्दभेद के विचार से विशेषण का शब्द है, जो ‘दी’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘क्षय होना’ है, जिसके अन्त मे ‘क्त्’ प्रत्यय जुड़ा हुआ है, जिसके कारण ‘दीन’ शब्द की रचना होती है। इसकी भावबोधक संज्ञा ‘दीनता’ है, जिसे ‘दरिद्रता’, ‘ग़रीबी’, ‘निर्धनता’ इत्यादिक कहते हैँ।

‘दीन’ के समानार्थी शब्द हैँ :– दरिद्र, ग़रीब, निर्धन, हीन इत्यादिक। इसके भिन्नार्थी शब्द हैँ :– दु:खित; कातर; उदास; नम्र आदिक।

अब इसके साथ जुड़े शब्द ‘दयालु’ को समझेँ।

दयालु :– यह शब्दभेद के विचार से विशेषण का शब्द है। इसका मूल शब्द ‘दया’ है, जो कि शब्दभेद के विचार से संज्ञा का शब्द है तथा लिंग-दृष्टि से पुंल्लिंग-शब्द। सहानुभूति की क्रिया वा भाव ‘दया’ कहलाती है। इसके समानार्थी शब्द है :– कृपा, अनुकम्पा, अनुग्रह, रह्म (‘रहम’ अशुद्ध है।), रह्मत (‘रहमत’ अशुद्ध है।) इत्यादिक।

‘दया’ मे ‘दय्’ धातु प्रयुक्त है, जिसका अर्थ ‘पालन करना’ है। इस धातु मे ‘अङ्’ और ‘टाप्’ प्रत्ययोँ के योग से ‘दया’ शब्द का सर्जन (‘सृजन’ अशुद्ध है।) होता है।

अब ‘दयालु’ शब्द की रचना समझेँ। यह ‘पालन करना’ के अर्थ मे ‘दय्’ धातु का शब्द है, जिसमे ‘आलुच्’ प्रत्यय के योग से ‘दयालु’ शब्द का सर्जन होता है। इसका अर्थ है, ‘बहुत दया करनेवाला’। इसके समानार्थी शब्द हैँ :– कृपालु, दयामय, रहीम (रह्म करनेवाला), कृपामय, दयानिधि, दयावन्त, दयावान्, दयाशील, दयार्द्र, दयापूर्ण इत्यादिक।

● लेखक व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी हैँ।
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