शिवत्व की यात्रा : तप की अग्नि है गृहस्थाश्रम


संध्या का समय था। सूर्य पश्चिम दिशा में ढल रहा था और आकाश में लालिमा फैलती जा रही थी। सुधांशु आश्रम की पगडंडी से आगे बढ़ रहा था। उसके कदम धीमे थे, पर मन में एक विचित्र कंपन था। वर्षों बाद वह अपने घर लौट रहा था—किन्तु अब वह वही व्यक्ति नहीं था जो कभी घर छोड़कर गया था।

उसके भीतर साधना का बीज अंकुरित हो चुका था।

किन्तु उसी के साथ एक प्रश्न भी बार-बार उठ रहा था—

क्या साधना और गृहस्थ जीवन एक साथ सम्भव हैं?

चलते-चलते उसने पीछे मुड़कर आश्रम की ओर देखा। दूर पर्वत की तलहटी में स्थित आश्रम अब धुँधला दिखाई दे रहा था।

उसे लगा मानो वह केवल स्थान नहीं छोड़ रहा, बल्कि अपने जीवन के एक अध्याय से दूसरे अध्याय में प्रवेश कर रहा है।

उसके भीतर आचार्य के शब्द गूंज रहे थे—

“वन में साधना सरल है, वत्स… गृहस्थाश्रम में साधना ही वास्तविक तप है।”


रात होते-होते सुधांशु अपने गाँव के निकट पहुँच गया।

गाँव वही था—कच्ची गलियाँ, मिट्टी के घर, और दूर खेतों में जलती हुई ढिबरियाँ। किन्तु वर्षों की दूरी ने उसे सब कुछ नया-सा बना दिया था।

जब वह अपने घर के सामने पहुँचा तो कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।

यह वही घर था जहाँ उसने अपना बचपन बिताया था। यही आँगन था जहाँ कभी उसके पिता उसे वेद के मंत्र सिखाया करते थे।

और यही वह स्थान था जहाँ से एक दिन उसने संसार और सत्य की खोज में घर छोड़ दिया था।

उसने धीरे से द्वार खटखटाया।

भीतर से कदमों की आहट आई।

द्वार खुला।

सामने उसकी पत्नी माधवी खड़ी थी।

कुछ क्षण दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।

समय जैसे ठहर गया था।

माधवी की आँखों में आश्चर्य भी था और एक गहरी पीड़ा भी—वह पीड़ा जो वर्षों की प्रतीक्षा से जन्म लेती है।

उसने धीमे स्वर में पूछा—

“आप… सचमुच लौट आए?”

सुधांशु ने सिर झुका दिया।

“हाँ… गुरुदेव की आज्ञा से।”

माधवी की आँखों में अचानक आँसू आ गए।

“गुरुदेव की आज्ञा से…?”

उसने हल्की कड़वाहट के साथ कहा—

“तो क्या अब भी आपका जीवन आपका नहीं है? अभी भी कोई और ही तय करेगा कि आप कहाँ रहें, क्या करें?”

सुधांशु चुप रहा।

यह वही प्रश्न था जिससे आचार्य ने उसे पहले ही सावधान किया था।

कुछ क्षण बाद उसने शांत स्वर में कहा—

“माधवी, मैंने घर इसलिए नहीं छोड़ा था कि मैं अपने कर्तव्यों से भाग जाऊँ। मैं सत्य को समझने गया था।”

माधवी ने उसकी ओर देखा।

“और क्या आपको सत्य मिल गया?”

सुधांशु कुछ क्षण मौन रहा।

फिर बोला—

“सत्य का मार्ग मिल गया है… किन्तु यात्रा अभी शेष है।”

माधवी हल्का-सा हँस पड़ी।

उस हँसी में व्यंग्य भी था और पीड़ा भी।

“अजीब बात है,” उसने कहा, “जो व्यक्ति सत्य की खोज में गया था, वह अपने पीछे इतने प्रश्न छोड़ गया कि घर का हर कोना उन्हीं प्रश्नों से भर गया।”

सुधांशु ने उसकी ओर देखा।

“क्या तुम मुझसे क्रोधित हो?”

माधवी ने उत्तर देने से पहले कुछ क्षण सोचा।

फिर बोली—

“क्रोध… शायद नहीं। किन्तु एक पीड़ा अवश्य है। क्योंकि जब आप गए थे, तब आपने केवल अपने मार्ग के बारे में सोचा था… मेरे बारे में नहीं।”

ये शब्द तीर की तरह सुधांशु के हृदय में लगे।

वह समझ गया—

यही उसकी पहली परीक्षा है।


कुछ देर बाद दोनों आँगन में बैठ गए।

आकाश में चन्द्रमा निकल आया था।

माधवी ने शांत स्वर में पूछा—

“क्या आपके गुरु ने आपको वापस भेजते समय कुछ कहा था?”

सुधांशु ने उत्तर दिया—

“उन्होंने कहा था कि गृहस्थ जीवन ही मेरी साधना का क्षेत्र है।”

माधवी ने उसकी ओर गम्भीर दृष्टि से देखा।

“तो क्या इसका अर्थ यह है कि अब आप साधना करेंगे… और मैं फिर से उसी जीवन में रहूँगी जहाँ मैं केवल प्रतीक्षा करती रहूँ?”

सुधांशु ने धीरे से सिर हिलाया।

“नहीं माधवी… अब मैं समझ गया हूँ कि साधना केवल जंगलों में नहीं होती।”

“तो कहाँ होती है?”

सुधांशु ने उत्तर दिया—

“वहीं जहाँ जीवन हमें सबसे अधिक चुनौती देता है।”

फिर उसने गम्भीर स्वर में कहा—

“गृहस्थ जीवन में हर दिन हमें अपने अहंकार को त्यागना पड़ता है। हर दिन हमें किसी और की खुशी को अपनी खुशी से ऊपर रखना पड़ता है। यही तप है।”

माधवी कुछ क्षण मौन रही।

फिर उसने पूछा—

“तो क्या यही कारण है कि आपके गुरु ने आपको वापस भेजा?”

सुधांशु ने धीरे से कहा—

“हाँ। क्योंकि उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने घर में धर्म नहीं निभा सकता, वह संसार को धर्म का उपदेश देने का अधिकार नहीं रखता।”

माधवी की आँखों में पहली बार हल्की शान्ति दिखाई दी।

किन्तु उसी क्षण उसने एक और प्रश्न पूछा—

“और यदि किसी दिन धर्म और प्रेम आमने-सामने खड़े हो जाएँ… तब क्या करेंगे आप?”

यह प्रश्न सुनते ही सुधांशु के भीतर जैसे बिजली कौंध गई।

उसे आचार्य के शब्द याद आए—

“जब धर्म और प्रेम के बीच संघर्ष हो, तब धर्म को चुनने का साहस ही शिवत्व है।”

किन्तु यह उत्तर देना सरल नहीं था।

क्योंकि अब यह केवल सिद्धांत का प्रश्न नहीं था।

यह उसके जीवन का प्रश्न था।

उसने गहरी साँस ली।

फिर धीरे से कहा—

“यदि कभी ऐसा समय आया… तो मैं ऐसा मार्ग खोजने का प्रयास करूँगा जहाँ धर्म भी जीवित रहे और प्रेम भी।”

माधवी ने उसकी ओर देखा।

“और यदि ऐसा मार्ग न मिला?”

सुधांशु चुप हो गया।

आकाश में चन्द्रमा बादलों के पीछे छिप गया।

कुछ क्षण बाद उसने बहुत धीमे स्वर में कहा—

“तब मुझे वही करना होगा… जो शिव ने किया था।”

माधवी के चेहरे पर एक क्षण के लिए भय की छाया आ गई।

और उसी क्षण सुधांशु को महसूस हुआ—

उसकी साधना की अग्नि अब सचमुच प्रज्वलित हो चुकी है।

क्योंकि अब उसका संघर्ष जंगलों के राक्षसों से नहीं था…

अब उसका संघर्ष अपने ही हृदय से था।


‘शिवत्व की यात्रा’ डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव का अप्रकाशित उपन्यास है। वेबसाइट www.indianvoice24.com पर इसे धारावाहिक के रूप मे प्रस्तुत किया जा रहा है।