भारत की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए उत्तरदायी कौन?— एक

अर्थतन्त्र

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज भारत देश के आर्थिक पहिये बेलगाम हो चुके हैं। यही कारण है कि वे अपना संतुलन खोकर ऊबड़-खाबड़ रास्ते से भागे जा रहे हैं। इसका सामान्य जन-जीवन पर सीधा असर पड़ता देखा जा सकता है। व्यावहारिक बाज़ार मे भारत पूरी तरह से विफल दिख रहा है। यही कारण है कि उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक बाज़ार मे शोचनीय स्थिति तक पहुँच चुकी है। जब किसी देश की मुद्रा मे लगातार गिरावट होती रहे तो यह इस बात का संकेत होता है कि उस देश की माली हालत बदतर हो चुकी है। भारत की मुद्रा औंधे मुह गिर चुकी है। $ १ का मूल्य भारत के ₹ ८२.८३ के बराबर हो चुका है। वैश्विक मंच पर जब कोई भारतीय एक डॉलर मे किसी वस्तु का क्रय करेगा तब उसे ८२ रुपये ८३ पैसे ख़र्च करने पड़ेंगे। इससे भारतीय मुद्रा के सम्मान को वैश्विक बाज़ार मे ज़बरदस्त चोट पहुँची है, जिसके लिए भारत की मोदी-सरकार की आर्थिक नीतियाँ पूरी तरह से उत्तरदायी हैं।

‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ को वर्ष २०१४ से अब तक बात-बात पर कोसती आ रही है, जबकि कथित मोदी-सरकार आर्थिक स्तर पर पूरी तरह से विफल रही है। वह केवल अपनी नाकामी छिपाने के लिए काँग्रेस को मुहरा बनाती आ रही है। हमे भूलना नहीं चाहिए कि नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, जे० पी० नड्डा, निर्मला सीतारमण आदिक भारतीय जनता पार्टी के नेता अपने-अपने मूल कर्मो से अलग हटकर, एक ऐसे बीभत्स प्रचारतन्त्र को विकसित कर चुके हैं, जहाँ ऐसा लगता है, मानो नरेन्द्र मोदी के शासनकाल से पहले भारत पराधीन था। इसे एक विवादास्पद महिला कंगना रानौत ने बोला भी था, जो भारतीय जनता पार्टी से सम्बद्ध भी है।

‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ को बुरा-भला कहनेवाले भूल जाते हैं कि जिस अनुपात मे महँगाई-दर नरेन्द्र मोदी की सरकार मे बढ़ायी गयी है, उस अनुपात मे ‘भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस’ और ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन’ के शासनकाल मे कभी नहीं बढ़ायी गयी थी। मोदी-सरकार को तो ₹ १० की वस्तु का मूल्य ₹ ५०० तक करने मे कहीं कोई हिचक तक नहीं रही है, जिसे भारत की जनता मौन धारण करते हुए, लगातार देखती आ रही है; क्योंकि भारत मे शासन-प्रशासन के स्तर पर भय का एक ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि वह आशंकित जनता ‘गांधी जी के तीन बन्दरों’ की भूमिका मे जीने के लिए बाध्य और विवश है।

वर्ष २०१४ से अब तक जिस तरह से वैश्विक बाज़ार मे भारतीय रुपये का अवमूल्यन होता रहा है, वह मोदी-सरकार की कार्यक्षमता के सम्मुख एक गम्भीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। जब यह देश १५ अगस्त, १९४७ ई० को आज़ाद हुआ था तब एक डॉलर की क़ीमत एक रुपया था; लालबहादुर शास्त्री के कार्यकाल मे लगभग १७ वर्षों-बाद ₹ ४.६७; इन्दिरा गांधी के समय मे ₹ ७.५; राजीव गांधी के समय मे ₹ १२.३७ तथा मनमोहन सिंह तक पहुँचते-पहुँचते $ १ का मूल्य ₹ ४५.३२ तक ही हुआ था। इससे यह साफ़ हो जाता है कि आज़ादी मिलने के बाद से नरेन्द्र मोदी के प्रधानमन्त्री बनने से पहले तक $ १ का मूल्य ₹१ से लेकर ₹ ४५.३२ तक ही रहा था। नरेन्द्र मोदी की सरकार का गठन हुआ और देखते-ही-देखते, काँग्रेसी नेता और तत्कालीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल मे $ १ के सापेक्ष जिस रुपये की क़ीमत ₹ ४५.३२ थी, वही रुपया नरेन्द्र मोदी-सरकार के कार्यकाल मे उछाल मारता हुआ, ₹ ८२.८३ तक पहुँच चुका है। इस प्रकार आँकड़े बोलते हैं कि ६६ वर्षों मे $ १ की क़ीमत केवल ₹ ४५.३२ रही, जबकि ८ वर्षों के भीतर ही $ १ की तुलना मे ₹ ३७.५१ की वृद्धि हो चुकी है। इतना सब होने के बाद भी नरेन्द्र मोदी अपने भाषणो मे कहते सुने जाते हैं– भारत विश्व मे ‘दूसरा’ श्रेष्ठ अर्थव्यवस्थावाला देश बन चुका है। यह कितना विस्मित करनेवाला विरोधाभास है :– पहली ओर, लगातार रुपये की क़ीमत का घटना और दूसरी ओर, भारत को विश्व का दूसरा श्रेष्ठ अर्थव्यवस्थावाला देश बताना?…! यहाँ भी अभी तक इसी को सुनिश्चित करने के लिए भारतीय जनता पार्टी मे रार मची हुई है कि वास्तव मे, भारत की अर्थव्यवस्था विश्व मे किस स्थान पर है। नरेन्द्र मोदी ‘दूसरी’ बताते हैं; नितिन गडकरी ‘पाँचवीं’ तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ‘छठी’ बताते हैं। भले ही सितम्बर, २०२२ ई० मे ग्रेट ब्रिटेन को पीछे छोड़कर भारत विश्व की पाँचवीं बड़ी अर्थव्यवस्थावाला देश बन गया है अथवा काग़ज़ पर बनवा दिया गया है फिर भी इस उपलब्धि ने अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ गये हैं।

‘संयुक्त राष्ट्र विकास-कार्यक्रम’ ने मानवविकास-सूचकांक अर्थात् एच० डी० आर०-रिपोर्ट– २०२१-२२ प्रसारित कर दी है, जिसके अनुसार, मानवविकास-सूचकांक मे जो भारत वर्ष २०२० मे १३०वें स्थान पर था, जो वर्ष २०२१ मे १३२वें स्थान पर सरक आया था, जबकि वर्ष २०२२ का आँकड़ा आना शेष है। ज्ञातव्य है कि मानवविकास- सूचकांक का निर्धारण जीवन की औसत आयु, शिक्षा तथा प्रति व्यक्ति आय के आधार पर किया जाता है। इसे लेकर सरकारी पक्ष ‘कोविड– १९’ की आड़ लेता आ रहा है, जबकि उस विषाणु के प्रभाव से विश्व के सभी देश प्रभावित थे। इसके बाद भी वर्ष २०२१ मे भारत मे मानवविकास- सूचकांक मे १.४ प्रतिशत की गिरावट आयी थी, जबकि विश्वस्तर पर यह ०.४ प्रतिशत थी। हमे नहीं भूलना चाहिए कि वर्ष २०१५ से २०२२ की वर्तमान अवधि मे भारत का मानवविकास-सूचकांक लगातार लुढ़कता आ रहा है; वहीं उन्हीं अवधि मे श्रीलंका, भूटान, बांग्लादेश, संयुक्त अरब अमीरात, मालदीव, भूटान आदिक अपेक्षाकृत कम सुविधा-साधनवाले देश मानवविकास-सूचकांक मे ऊपर की ओर बढ़ते जा रहे हैं।

आज प्रत्येक भारतवासी पर कितना क़र्ज़ लद चुका है? जनता इस प्रश्न के उत्तर से वाक़िफ़ नहीं है और होना भी नहीं चाहती। वह तो चर्चित दार्शनिक चार्वाक के उस कथन को जी-भोग रही है, जिसका अर्थ है– जब तक जियें, सुखपूर्वक जियें और क़र्ज़ लेकर घी पियें। “यावज्जीवेत सुखं जीवेद, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत।”

इसी प्रमाद के कारण वर्तमान मे, भारत के प्रत्येक नागरिक पर सितम्बर, २०२१ ई० तक ₹ ९२,३४८ का ऋण चढ़ चुका था। उस प्रमादी जनता को अब मालूम हो जाना चाहिए कि पानी पी-पीकर काँग्रेस को गालियाँ देनेवाली नरेन्द्र मोदी-सरकार मे ही पिछले ७ वर्षों मे भारत के प्रति व्यक्ति पर ६ हज़ार का ऋण चढ़ा दिया गया है। इसका प्रमुख कारण है, ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’-द्वारा लगातार विदेशी क़र्ज़ लेते रहना और उन क़र्ज़ों को न पटाना।

भारत की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए उत्तरदायी कौन?— दो और अन्तिम भाग

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● लेखक भाषाविज्ञानी और उन्मुक्त विचारक हैं।
यायावर-भाषकसंख्या– ९९१९०२३८७०
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ९ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)