आओ! किसी रोते को हँसाने की आदत डालें

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


आओ! अब कड़ुए घूँट पीने की आदत डालें,
आओ! अब मरकर भी जीने की आदत डालें।
हवा अच्छी हो या बुरी उसे तो बहना ही है,
आओ! अब चलते रहने की आदत डालें।
सफीना* चल पड़ी है तो डरना कैसा? (*नौका)
आओ! हवा का रुख़ मोड़ने की आदत डालें।
कोशिश करनेवाले पीछे पलटकर देखते नहीं,
आओ! बालू से तेल निकालने की आदत डालें।
मज़ा तब है जब बेमज़ा जीने का हुनर पा जायें,
आओ! बेसहारे को सहारा देने की आदत डालें।
ख़ुशी में ख़ुद का चेहरा आईने को क्यों दिखाते,
आओ! किसी रोते को हँसाने की आदत डालें |


(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १० फरवरी, २०१८ ईसवी)