● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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एक बात समझ मे नहीँ आती– जब यह बात साफ़ हो चुकी है और जिसे सी० बी० एस० ई० के अधिकारी और केन्द्रीय शिक्षामन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान मान चुके हैँ कि परीक्षा मे अनियमितता हुई है तब सी० बी० एस० ई० की ओर से सम्बद्ध विद्यालयोँ के-की प्रधानाचार्योँ पर यह दबाव क्योँ बनाया जा रहा है कि वे परीक्षा-प्रणाली का गुणगान करते हुए, उत्तरपुस्तिका-परीक्षण और मूल्यांकन-पद्धति का महिमामण्डन करेँ। बेचारे यश:गान नहीँ करेँगे तो नौकरी ख़तरे मे– जायेँ तो जायेँ कहाँ की स्थिति बन चुकी है। यही कारण है कि जो महिला-पुरुष प्रधानाचार्य ‘ओ० एस० एम०’-प्रणाली पर दबी ज़बान से अँगुली उठा रहे थे, अब वे भी प्रशस्ति-गायन करने के लिए बाध्य कर दिये गये हैँ। दूसरे शब्दोँ मे– अब वे विशुद्ध रटन्तू ‘तोता-तोतिन’ बना दिये गये हैँ।
ऐसा आरोप मढ़ा जा रहा है कि सी० बी० एस० ई० के क्षेत्रीय कार्यालयोँ की ओर से सम्बन्धित विद्यालयोँ के-की प्रधानाचार्योँ को निर्देश किये गये हैँ कि वे बदनाम परीक्षा-प्रणाली ‘ओ० एस० एम०’ का प्रशस्तिपाठ करेँ, जिसके लिए उन्हेँ एक मुक्त मीडिया (सोसल मीडिया) पर टूल किट उपलब्ध कराया गया है, जिसमे कहा गया है कि वे उक्त प्रणाली के समर्थन मे जितना हो सके, प्रचार-प्रसार करेँ। एक प्रकार से सी० बी० आइ० ने अपनी सार्वजनिक हो चुकी नाकामी को छिपाने की विफल प्रयास करते हुए, केन्द्रीय विद्यालयोँ, जवाहर नवोदय विद्यालयोँ के-की प्रधानाचार्योँ पर गुणगान करने का दबाव डालते हुए, कीचड़ पर लाठी मारने का काम कर दिया है। प्रधानाचार्योँ ने विद्यार्थियोँ से भी नयी डिज़िटल-प्रणाली के परिणाम को पाक-साफ़ बताने के लिए प्रेरित किया है।
अब जो तथ्य सामने आया है, उससे सुस्पष्ट होता है कि सी० बी० एस० ई० की ओर से प्रधानाचार्योँ के नाम से जो निर्देशात्मक सामग्री प्रेषित की गयी है, उसका अँगरेज़ी मे शीर्षक है– ‘मैटेरियल फॉर प्रिंसिपल्स’ (प्रधानाचार्योँ के लिए सामग्री)। उसमे इस बात की व्यवस्था की गयी है कि प्रधानाचार्योँ को ओ० एस० एम०’-प्रणाली की उपयोगिता और महत्ता का प्रतिपादन किन शब्दोँ और किस शैली मे करना है। यह भी लिखा है, जिसका भावानुवाद है :–
जब भी इतने व्यापक स्तर पर कोई प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) लागू की जाती है तब उसमे कुछ छोटी-मोटी कठिनाई आती ही है, जो चिन्ता का कारण बन सकती है; लेकिन घबराने की आवश्यकता नहीँ है। मै हर विद्यार्थी और अभिभावक को यह भरोसा दिलाना चाहता हूँ कि किसी विद्यार्थी को किसी प्रौद्योगिक-त्रुटि के कारण किसी प्रकार की क्षति नहीँ होने दी जायेगी।
प्रधानाचार्योँ को यह भी निर्देश किया गया है कि वे विद्यार्थियोँ को बतायेँ कि यदि उन्हेँ अपने प्रदर्शन और डिज़िटल शीट पर दिख रहे परिणाम मे कोई अन्तर दिखता है तो उन्हेँ बोर्ड की आधिकारिक ‘रीवैल्यूएशन’-प्रक्रिया का उपयोग करना चाहिए।
चाटुकारिता और नैतिकता को तिलांजलि देकर सरकारी सेवा मे बने रहने का लोभ क्या न करा दे। तोता-तोतिनो मे ओ० एस० एम०-प्रणाली का प्रशस्तिवाचन करने के लिए होड़ लग गयी है, जोकि एक प्रकार की घोर बेशर्मी है।
खेद और दु:ख का विषय है कि विद्यार्थियोँ की उनके भविष्य के प्रति चिन्ता, तनाव और अवसाद की स्थिति समझने और उनके प्रति सहानुभूति जताने की जगह प्रधानाचार्य सी० बी० एस० ई०-द्वारा लागू की गयी प्रणाली ‘ओ० एस० एम०’ की चापलूसी करते रँगे-हाथोँ पकड़े जा रहे-रही हैँ।
आश्चर्य तब हुआ जब केन्द्रीय विद्यालय नम्बर १, एअरफ़ोर्स स्टेशन, गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) के एक विद्यार्थी ने आरोपित प्रणाली के पक्ष मे कहता हुआ दिख रहा है :– “मै अपने उन अंकोँ से संतुष्ट हूँ, जो मुझे सभी विषयोँ मे मिले हैँ। विद्यार्थियोँ को जिन समस्याओँ का सामना करना पड़ रहा है, कोई नयी बात नहीँ है। मुझे नहीँ लगता कि ओ० एस० एम० कोई समस्या है।”
उपर्युक्त विद्यार्थी का उक्त कथन उन लाखोँ विद्यार्थियोँ के लिए जले पर नमक है, जो न्याय पाने के लिए जूझ रहे हैँ। ज़ाहिर है, उससे कहलवाया गया है। उस विद्यालय के प्रधानाचार्य बैरिस्टर पाण्डेय ने उस छात्र के पक्ष मे कहा है, ”छात्र इस विवाद मे अपनी राय साझा कर सकते हैँ और हमारे स्कूल-स्टाफ़ का फ़ैसला था कि हमे सोसल मीडिया पर ओ० एस० एम० के विषय मे अपने छात्रोँ की राय डालनी चाहिए।”
यहाँ यह ध्यान करने की बात है कि कथित प्रधानाचार्य ने सफ़ेद झूठ बोला है कि स्कूल ने टूलकिट का पालन किया। प्रश्न है– जब बैरिस्टर पाण्डेय के स्कूल ने टूलकिट का पालन किये बिना ही उक्त छात्र से ओ० एस० एम० का गुणगान करा दिया तब वही गुणगान उस समय क्योँ नहीँ कराया था जिस समय विद्यार्थी परीक्षा-परिणाम देखकर उद्वेलित और आक्रोशित थे; टूलकिट पाने के बाद ही उनका स्कूल ‘तोता’ की भूमिका मे क्योँ दिखने लगा है?
जवाहर नवोदय विद्यालय, जाजपुर के प्रभारी प्रधानाचार्य अभिमन्यु कहते हैँ, “ओ० एस० एम० सी० बी० एस० ई० की एक बहुत अच्छी पहल है; उत्तरोँ का सही मूल्यांकन किया गया है। शिक्षकोँ को हर एक चीज़ पढ़ने के लिए काफ़ी समय मिला।”
दिल्ली पब्लिक स्कूल, सिलीगुड़ी, असम की प्रधानाचार्य अनीषा शर्मा अपने चेहरे पर हँसी बिखेरते हुए बोलती हैँ– ओ० एस० एम० को एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ शुरू किया गया था, यह ध्यान मे रखते हुए कि मूल्यांकन निष्पक्ष, सटीक, तेज़ और पारदर्शी होगा।
अनीषा ने हू-ब-हू वही बताया, जो टूल किटवाले दस्तावेज़ मे लिखकर भेजा गया था। उनके अतिरिक्त बड़ी संख्या मे प्रधानाचार्योँ ने ओ० एस० एम० का भजन-कीर्त्तन किया है। कानपुर के पद्मपत सिंघानिया स्कूल की प्रधानाचार्य भावना गुप्ता से लेकर बोरझाम, असम के माइल्स ब्रॉन्सन स्कूल के प्रधानाचार्य नृपेनकुमार दत्ता, नई दिल्ली के के० आर० मंगलम् वर्ल्ड स्कूल, जीके-२ की प्रधानाचार्य ज्योति गुप्ता इत्यादिक सरकारी गायन करते हुए दिखे हैँ।
कुछ ही ऐसे प्रधानाचार्य ऐसे रहे हैँ, जिन्होँने ओ० एस० एम० के पक्ष मे वीडियो बनवाकर सोसल मीडिया मे भेजने से स्वयं के स्कूल को अलग कर लिया था। वे सब अभी तक अपनी नैतिकता बचाये हुए हैँ। कुछ ऐसे अर्द्ध-नैतिकवान् प्रधानाचार्य भी हैँ, जिन्होँने प्रशस्तिपत्र का वाचन स्वयं न करके, किसी अध्यापक/अध्यापिका से करा दिया; क्योँकि ऊपरी निर्देश का अनुपालन कराना ही था। उनको यह भी मालूम है कि देश के सर्वाधिक प्रभावशाली शैक्षणिक निकायोँ मे से एक केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद् (सी० बी० एस० ई०) के साथ सम्बद्ध विद्यालयोँ और प्रधानाचार्योँ को मिलजुलकर ही रहना होगा। भारत मे लगभग २८ हज़ार विद्यालय और विदेश मे शताधिक विद्यालय सी० बी० एस० ई० के साथ जुड़े हुए हैँ, इसलिये उसका आदेश-निर्देश की अवमानना ‘अपराध’ कहलायेगी।
भले ही प्रशस्ति-गायन का अभियान छेड़वा दिया गया हो फिर भी सार्वजनिक होती आ रहीँ डिज़िटल मूल्यांकन-प्रणाली की जल्दबाज़ी मे की गयी प्रस्तुति, लगभग एक सप्ताह का प्रशिक्षण, लाखोँ उत्तरपुस्तिकाओँ को अचानक पूरी तरह से डिज़िटल मे डालना, लम्बे सब्जेक्टिव उत्तरोँ को स्क्रीन पर पढ़ते रहना, सर्वर का बार-बार रुक जाना, गणितीय रेखाचित्रोँ का सुस्पष्ट न दिखना– ये सब ऐसे कारक थे, जिनके कारण विद्यार्थियोँ के साथ न्याय नहीँ हो पाया है। यह भी बताया गया है कि कई परीक्षक सिस्टम को समझ-समझकर उत्तरपुस्तिकाओँ का परीक्षण कर रहे थे। जो अधिक अवस्था के परीक्षक थे, उनमे से अधिकतर को डिज़िटल-मूल्यांकन-प्रणाली को समझने मे बहुत कठिनाई हो रही थी।
धुँधली उत्तरपुस्तिकाएँ, बेमेल उत्तरपुस्तिकाएँ, अनुपयुक्त मूल्यांकन, पारदर्शिता का अभाव, उत्तरपुस्तिकाओँ मे से ग़ायब पन्ने आदिक विसंगति उपर्युक्त समस्त महिमामण्डन का ‘मानमर्दन’ करती हुई दिख रही हैँ।
इतना सब जान-समझ लेने के बाद अब एक नया नकारात्मक पक्ष उभरा है, जिसके अन्तर्गत कई प्रधानाचार्योँ और शिक्षकोँ का कहना है कि जो विसंगति परीक्षाफल घोषित होने के बाद अभी प्रकाश मे आयी हैँ, वे उत्तरपुस्तिकाओँ के परीक्षण करते समय ही दिख गयी थी। ‘ओ० एस० एम०’-प्रणाली के दौरान उन्हेँ बार-बार प्रौद्योगिक कठिनाइयोँ का सामना करना पड़ा था :– कभी स्कैन धुँधले हो जाते थे; कभी पूरक पर्णी (सप्लीमेण्ट शीट) नहीँ खुलती थी तो कभी स्क्रीन पर से अचानक पन्ने ग़ायब हो जाते थे। उन्हेँ समझ मे नहीँ आता था कि विद्यार्थी ने क्या लिखा है।
अँगरेज़ी-दैनिक समाचारपत्र ‘टाइम्स ऑव़ इण्डिया’ के एक संवाद (रिपोर्टिंग) के अनुसार, शिक्षक-शिक्षिकाओँ का आरोप है कि मार्च, २०२६ ई० मे सी० बी० एस० ई० की ओर से एक परिपत्र (सर्कुलर) प्रसारित किया गया था, जिसमे उन्हेँ सोशल मीडिया पर मूल्यांकन-प्रक्रिया से जुड़ी ‘भ्रामक जानकारी’ प्रसारित न करने का आदेश किया गया था, जिसके परिणाम के भयवश बहुसंख्य शिक्षक-शिक्षिकाओँ ने स्वयं को मात्र मूकदर्शक बना रखा है, यद्यपि ओ० एस० एम०-प्रणाली-परिणाम के प्रति उनमे भी आक्रोश है। उन्हेँ यह भी मालूम था कि परीक्षाफल प्रसारित होते ही विद्यार्थियोँ का आक्रोश दिखेगा। परीक्षण करते समय इस विन्दु पर भी चर्चा होती थी; लेकिन कोई आधिकारिक रूप मे परीक्षण-प्रणाली के विरुद्ध आने की स्थिति मे नहीँ था; परन्तु ऐसा विस्फोट हुआ कि सी० बी० एस० ई० और शिक्षामन्त्रालय ‘सच’ का सामना करने का नैतिक साहस नहीँ जुटा पा रहा है।
(क्रमश:)