
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)
डॉ. पृथ्वीनाथ पाण्डेय-
‘दो-तिहाई’ शब्द देश में सत्ता-सुख भोगने के लिए है; राजधर्म से वंचित रखने के लिए है तो ‘निरंकुशता’ का चरित्र जीने के लिए है। हाँ, दो-तिहाई बहुमत प्राय: पूर्णत: विश्वसनीय सिद्ध नहीं होता, क्योंकि आचरण की सभ्यता में शुचिता नहीं रहती। ऐसा इसलिए कि कहीं अल्पसंख्यक का संघटित समूह दिखायी देता है तो कहीं सम्प्रदाय, जाति, वर्ग, पन्थ इत्यादिक में विभाजित किये गये बहुसंख्यक की निर्णायक भूमिका लक्षित होती है।
आज जिस शक्तिमती ने मात्र अपनी सामर्थ्य पर सम्पूर्ण भारत को दोलायमान और कम्पायमान कर दिया है, उसके ‘आतंक’ के विरुद्ध विश्व में किसी भी शक्ति के पास सामर्थ्य नहीं है कि उसको स्पर्श तक करने का विषय कल्पनाजगत् में ला सके। हमारी ‘प्रकृति के आतंक’ को ‘हिन्दू’ और ‘मुसलमान’ के रूपों में देखने की धृष्ठता क्यों नहीं करते हो? है साहस?
हम उसके मूल आराधक हैं और वह हमारी प्रथम आराध्या है। वह परा-शक्ति जब अनयी, कामी, पामर, पिंगल इत्यादिक अत्याचारियों-अनाचारियों-कदाचारियों की नृशंसता की पराकाष्ठा को अनुभव करती है तब अपना ‘तीसरा नेत्र’ खोलती है; परिणाम :– वह आवृष्टि और अनावृष्टि, भूकम्प और चक्रवात्, भूस्खलन और हिमस्खलन, ज्वालामुखी, आकाशविस्फोट, दावानल-बड़वानल इत्यादिक के रूपों में स्थावर-जंगम की अतिवादिता को समाप्त कर, सृष्टि-सन्तुलन करती है।
आज ‘दो-तिहाई’ भारत को हमारी परा-प्रकृति के प्रकोप के सम्मुख घुटने टेकने पड़ रहे हैं। आवृष्टि के परिणामस्वरूप जल-प्रलय के आंशिक परिदृश्य से साक्षात् करो और अपने पापों का प्रयश्चित्त कर लो, अन्यथा आपदा पापियों को महाविनाश के गह्वर में गिराने के लिए तत्पर है।
पारिस्थितिकी सन्तुलन को नष्ट करनेवालो! अब भी समय है; मन-परिवर्त्तन करो और अपनी ‘समग्र प्रकृति’ की आराधना करना सीखो। विश्वविज्ञानियो! हमारी प्रकृति को ‘विध्वंस’ की प्रयोगशाला मत बनाओ; सृष्टि के साथ बलप्रयोग करते हुए, अपनी मस्तिष्क-उपयोगिता को अतिरेकता से सुदूर रखो, अन्यथा प्रकृति का विचलन और विघटन समूची मानव-सभ्यता का अन्त कर देगा।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १४ जुलाई, २०१८ ईसवी)