राश दादा राश (दार्शनिक/साहित्यकार)-

जमीं से उठता वो ;जो
आसमाँ नजर आता है
ये सही नहीं
वो आशियाँ बनाता है
बलुआई रेत के संशय
सुखद
लुभाए ,, ,, मृगमरीचिका
जो टूटे धैर्य का बन्धन
करूँ क्रन्दन ; मैं क्रन्दन ।।
राश दादा राश (दार्शनिक/साहित्यकार)-

जमीं से उठता वो ;जो
आसमाँ नजर आता है
ये सही नहीं
वो आशियाँ बनाता है
बलुआई रेत के संशय
सुखद
लुभाए ,, ,, मृगमरीचिका
जो टूटे धैर्य का बन्धन
करूँ क्रन्दन ; मैं क्रन्दन ।।