‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय
★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय :
हमारे श्रमिक-वर्ग को उनके घर तक पहुँचाने के लिए केन्द्र और राज्य की सरकारों के पास कोई ठोस योजना नहीं है। यही कारण है कि स्वयं को असुरक्षित महसूस करने के कारण किसी भी शर्त्त पर वह अपने घर पहुँचना चाहता है। केन्द्र-सरकार कुछ राग अलाप रही है तो राज्य-सरकारों के स्वर भिन्न-भिन्न हैं। ऐसे में, ‘जायें तो जायें कहाँ’ की स्थिति में स्वयं को घिरा पाकर वह श्रमिक-वर्ग किसी भी सूरत में अपने घर लौट आना चाहता है। अपनी जान जोख़िम में डालते हुए श्रमिक आबाल वृद्ध नर-नारी के साथ पर्वतीय और जलीय मार्गों से रास्ते तय करते हुए अपनी दिशा में बढ़ रहे हैं तब पुलिसवाले उनको लौटने के लिए बाध्य कर दे रहे हैं। उन्हें यदि कोई उदारमना भोजनादिक देने का प्रयास करता है तो ‘कोऱना योद्धा’ उपाधि को कलंकित करते हमारे उक्त सुरक्षाकर्मी दिख रहे हैं। ऐसे कुत्सित कर्मियों को बार-बार धिक्कार है!
प्रश्न है, उनकी समुचित देख-रेख की व्यवस्था पुलिसवाले क्यों नहीं सुनिश्चित करा पा रहे हैं। राज्यों के पुलिस कमीश्नर क्या कर रहे हैं? उनका दायित्व नहीं बनता कि वे दुर्गम मार्गों से जा रहे श्रमिकों की खोज-ख़बर करें। राज्य के मुख्यमन्त्रियों की बेहद घिनौनी भूमिका है। वे केवल आदेश और निर्देश करने में माहिर दिख रहे हैं; कर्म के धरातल पर वे शून्य दिख रहे हैं।
सरकारों की बेईमान नज़रिया का ही परिणाम है कि निर्बल, निर्धन, निश्शक्त, निरुपाय, निस्सहाय श्रमिकों की आये-दिन मार्ग-दुर्घटनाओं में मौत हो जा रही है।
देश के पुलिसकर्मी बिना उनके दु:ख-दर्द को सुने-समझे उन पर लाठियों से प्रहार कर रहे हैं, जो कि नितान्त अमानवीय है।
यहाँ ‘उच्चतम न्यायालय’ और ‘मानवाधिकार आयोग’ को स्वत: संज्ञान कर कठोर आदेश प्रसारित करना चाहिए, अन्यथा हमारी श्रमिक भाई-बहन ग़लत सरकारी नीतियों के चलते बड़ी संख्या में बेमौत मारी जायेंगी।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ मई, २०२० ईसवी)