“एक दिन चले जायेंगे ऐसे ही अचानक एक दिन” के गीतकार मुनीन्द्र श्रीवास्तव अब नहीं रहे

जाने-माने गीतकार, मृदुभाषी, जनप्रिय अधिवक्ता, कुशल रंगकर्मी ८० वर्षीय मुनीन्द्र श्रीवास्तव की कल (६ जनवरी) मध्यरात्रि में उनके निवासस्थान उचवाडीह, प्रयागराज में निधन हो गया था। वे बहुत समय से अस्वस्थ थे। आज (७ जनवरी) रसूलाघाट, प्रयागराज में उनका अन्तिम संस्कार किया गया। उन्हें मुखाग्नि उनके कनिष्ठ अधिवक्ता पुत्र अवनीश श्रीवास्तव ‘नीतू’ ने दी।

स्मृति-शेष मुनीन्द्र श्रीवास्तव

उन्होंने ‘हनुमत् स्तवन’, ‘जय सुभाष’, ‘चुटकी-भर राख’ आदि कृतियों की रचना कर साहित्यजगत् में अपनी पहचान बनायी थी। उनकी रचनाओं में जीवन जीने की कला झाँकती थी। ‘का करबS’ नामक उनकी रचना बहुत चर्चित रही है। ‘शहँशाह इडीपस’ नाटक में मुनीन्द्र श्रीवास्तव की भूमिका अति महत्त्व की रही है। वे अनेक पुरस्कार-सम्मानों से आभूषित हो चुके थे।

स्मृति-शेष मुनीन्द्र श्रीवास्तव के अन्तिम संस्कार के समय बड़ी संख्या में जनपद के साहित्यकार, कवि, अधिवक्ता आदिक उपस्थित थे। इसी अवसर पर आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की अध्यक्षता में ‘सर्जनपीठ’, ‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’, ‘शहर समता विचार मंच’, ‘रामायण मेला समिति’, ‘क्रान्तिकारी अधिवक्ता-संघ’, ‘,साहित्यकार-संसद्’ तथा ‘शलभ’ संस्थाओं के संयुक्त तत्त्वावधान में रसूलाबाद-श्मशानघाट पर एक शोकसभा का आयोजन किया गया, जिसमें जयशंकर मिश्र, डॉ० प्रदीप चित्रांशी, उमेश श्रीवास्तव, केशव सक्सेना, रजनीश श्रीवास्तव, अशोक कुमार सनेही, अभिषेक केसरवानी, मधुसूदन तिवारी, डॉ० शम्भुनाथ त्रिपाठी ‘अंशुल’, करुणेश, बाबू गुलाब सिंह, आदित्य मिश्र, रामकैलास प्रयागी, देवेश, संजय सक्सेना, सी० बी० सिंह, नाज़िम अली आदि ने स्मृति-शेष मुनीन्द्र श्रीवास्तव की सारस्वत और विधिक उपलब्धियों पर प्रकाश डाले थे।