सुधांशु बाजपेयी (प्रवक्ता, उप्र कॉङ्ग्रेस)
आज पत्रकारिता के पितामह और महान क्रांतिकारी क्रांतिकारी गणेश शंकर विद्यार्थी जी की शहादत दिवस है। जो भगत सिंह की शहादत के तीसरे ही दिन कानपुर में सांप्रदायिक दंगों को शांत करते हुए दंगाई भीड़ के हाथों शहीद हो गए वह कांग्रेस और क्रांतिकारियों के बीच सेतु की तरह थे जहां वह स्वयं संयुक्त प्रांत कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष थे वही क्रांतिकारियों के सबसे विश्वसनीय साथी उनका पत्र प्रताप का कार्यालय क्रांतिकारियों की सबसे सुरक्षित शरण स्थली था ।
भगत सिंह गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के आह्वान पर मैट्रिक की पढ़ाई छोड़ आजादी के आंदोलन में शामिल हो गये। लेकिन चौरीचौरा कांड से आहत होकर जब गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो भगत सिंह के युवा मन ठेस पहुंची। उन्हीं दिनों वह 1923 में विद्यार्थी जीवन में भगतसिंह जयचन्द्र जी के बहुत निकट संपर्क में आए।
इतिहासज्ञ जयचन्द्र विद्यालंकार लाहौर के कौमी महाविद्यालय में प्रोफेसर और पंजाब की गुप्त पार्टी के प्रमुख भी थे। उन्हीं दिनों लाहौर में शचीन्द्रनाथ सान्याल का आना हुआ जिन्होंने हिन्दोस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नींव रखी जिसे आगे भगत सिंह ने संशोधित कर “हिन्दोस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन” का नाम दिया। प्रोफेसर साहब ने भगत सिंह की सान्याल बाबू से भेंट करायी और भगत सिंह का जीवन उसी दिन बदल गया।भगत सिंह के घरवाले उनकी शादी कराना चाहते थे लेकिन वह तो खुद को आजादी की बलिवेदी पर समर्पित कर देना चाहते थे।इसलिए भगत सिंह को पार्टीके काम के लिए बाहर भेजना तय हुआ।
सान्याल जी ने क्रांतिकारी योगेश चंद्र चटर्जी के नाम पत्र देकर भगतसिंह को कानपुर भेज दिया। उस समय योगेश चंद्र चटर्जी पटकापुर मेस (बंगाली छात्रों की) में रहते थे। बंगाली मेस में एक सिख युवक का रहने से पुलिस को संदेह भी हो सकता था,साथ ही क्रांतिकारियों की आय का कोई साधन नहीं था,तो यह भी एक मुश्किल थी। इसका हल निकाला जयचंद्र विद्यालंकार जी ने, वह कानपुर आकर विद्यार्थी जी से मिले और उन्हें समस्या बताई। विद्यार्थी जी ने भगतसिंह को प्रताप कार्यालय में ही रख लिया।
भगत सिंह स्वेच्छा से वहीं पत्रकारिता के गुण सीखने और बलवंत सिंह के छद्म नाम से लेख भी लिखने लगे। तो विद्यार्थी जी उन्हें दस रुपये मासिक खर्च को भी दिया करते। कानपुर में यह नाम भगतसिंह को योगेश चंद्र चटर्जी ने ही गुप्त दल (क्रांतिकारी दल) की सदस्यता के साथ ही दिया था।भगत सिंह ने प्रताप अखबार में करीब ढाई साल नौकरी की।
चंद्रशेखर आजाद भी अक्सर विद्यार्थी जी से मिलने आया करते थे। प्रेस से कुछ ही दूरी पर विद्यार्थी जी का एक कमरा भी था। आजाद वहीं पर रुक जाया करते थे। भगत सिंह को जब यह बात पता चली तो उन्होंने विद्यार्थी जी से कहा कि उन्हें आजाद से मिलना है। एक रोज जब आजाद वहां आए तो गणेश शंकर ने भगत सिंह के बारे में उन्हें बताया, जिनका जिक्र वह पहले ही सान्याल और योगेश चंद्र से सुन चुके थे। यहीं पर भगत सिंह और चंद्रशेखर की मुलाकात हुई।
फिर कब दोनों इतना घुलमिल गये कि चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को काकोरी के क्रांतिकारियों को छुड़ाने के महत्वपूर्ण मिशन में उन्हें शामिल कर लिया, उसी सिलसिले में उनकी मुलाकात शिववर्मा से हुई । शिव वर्मा के साथ ही भगत सिंह डीएवी कॉलेज हास्टल में करीब डेढ़ महीने तक काकोरी कांड के क्रांतिकारियों को छुड़ाने की योजना के दौरान रहे थे। इसी कमरे में उनकी मुलाकात डा. महावीर सिंह, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त से भी हुई। जिसका जिक्र शिव वर्मा ने अपनी पुस्तक संस्मृतियाँ में भी की।
इसी तरह बाद में भी विद्यार्थी जी का प्रताप कार्यालय क्रांतिकारियों की सुरक्षित शरणस्थली बना रहा।