मौजूदा शासन-सत्ता की नीयत साफ़ नहीं

देश की कुल आबादी लगभग 140 करोड़ है।
प्रत्येक वर्ष लगभग प्रति व्यक्ति से उनकी नौकरी/रोजगार की आय से व रोजमर्रा में उपभोग की जाने वाली वस्तुओं को खरीदने/बेंचने पर अनुमानतः एवरेज ₹10000 का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष टैक्स सरकारों द्वारा वसूला गया पिछले 7 वर्षों में।

अर्थात 140 करोड़ × ₹10000 = 14 लाख करोड़ का सालाना टैक्स कलेक्शन।
नोट;
(जिन्हें इस अंक गणना पर शक़ हो वे समूचे राज्यों के सालाना कुल बजट को एकबार टोटल करके स्वयं प्रमाणित कर सकते हैं)

अब आगे चलते हैं…
मौजूदा भारतीय जनता पार्टी शासनसत्ता में पिछले 7 साल से है तो ₹14 लाख करोड़ × 7 साल = ₹98 लाख करोड़ टैक्स एकत्र किया गया।

काम सिर्फ 4 ही थे, हैं और रहेंगे सार्वजनिक रूप से नागरिकों के प्रति सरकारों द्वारा करने हेतु।

अब यदि मौजूदा सरकार की नीयत साफ़ होती अर्थात सत्यनिष्ठ व सत्यानुशासित होती तो न्यायोचित रूप से उपरोक्त 4 सार्वजनिक कामों हेतु 4 प्रकार के बजट बनाती।

पहला बजट 25% प्रत्येक नागरिक की पूर्ण शिक्षा-प्रशिक्षण के निःशुल्क अबाध्य अनिवार्य अवसर व संसाधन हेतु लगभग ₹24.5 लाख करोड़ शिक्षा बजट के रूप में वितरित करती।

दूसरा बजट 25% प्रत्येक परिवार के 1 सदस्य की नौकरी/रोजगार से जुड़े अवसर व संसाधन हेतु लगभग ₹24.5 लाख करोड़ रोजगार बजट के रूप में वितरित करती।

तीसरा बजट 25% प्रत्येक गाँव/मोहल्ले/तहसील/जिला की सड़क, पीने के साफ़ पानी, बिजली, संचार, परिवहन, बाज़ार, सामुदायिक भवन व अन्य सार्वजनिक सुविधाओं से जुड़े अवसर व संसाधन निर्माण हेतु लगभग ₹24.5 लाख करोड़ एकोमोडेशन बजट के रूप में वितरित करती।

चौथा बजट 25% प्रत्येक समुदाय के नागरिकों की सुरक्षा जैसे बीमा, बैंकिंग, उनके निःशुल्क स्वास्थ्य, पेंशन व सेल्टरिंग एवं सैन्य अभियान हेतु लगभग ₹24.5 लाख करोड़ नागरिक संरक्षण बजट के रूप में वितरित करती।
(चूँकि पांचवा कोई सार्वजनिक कार्य बचता नही सरकारों द्वारा जनता हेतु इसलिए फिजूल कोई अन्य बजट बनाने की आवश्यकता नही।)

लेकिन ऐसा किया नही।
क्योंकि मौजूदा शासनसत्ता की नीयत साफ़ नही है।

अपात्रों/कुपात्रों (धूर्त भाजपाईयों/कांग्रेसियों) की नीयत भला सत्यात्मक व न्यायशील कैसे हो सकती है ..बस यही विचारणीय बिंदु है ..!

अब आप सभी नेतृत्वकर्मियों/कार्यकर्ताओं/प्रचारकों/समर्थकों/पाठकों के लिए होमवर्क;

क्या पिछले 75 वर्षीय लोकतंत्र/गणतंत्र में अबतक हमारे देश के सरकारी खजाने में कभी लगभग ₹100 लाख करोड़ का टैक्स नहीं एकत्र हुआ?

या फिर टैक्स तो इससे कई गुणा लाख करोड़ रुपया एकत्र हुआ ..!
लेकिन धूर्तों ने कभी देश के नागरिकों के चारों जनाधिकारों को वितरित करने हेतु अपनी साफ़ नियत नही बनाई ..?

ऐसे कैसे हो सकता है कि इसी देश में एक पार्टी जो आंदोलन से निकलती है और मात्र 7 साल में एक लंगड़े-लूले राज्य दिल्ली की सम्पूर्ण जनता को उपरोक्त चारों जनाधिकार केंद्रीय शासनसत्ता से लड़-झगड़कर निःशुल्क, अबाध्य व अनिवार्य रूप से वितरित कर पाने में महारत हासिल कर लेती है और पूरी दुनिया के सामने एक मिसाल कायम करती है “दिल्ली मॉडल” के रूप में … बस दोस्तों सारा खेल साफ़ नीयत का है ..!

आओ मिलकर अब आमआदमीपार्टी के इस न्यायशील दिल्ली मॉडल को सम्पूर्ण भारतवर्ष में स्थापित करने हेतु आदरणीय अरविंद केजरीवाल जी को केंद्रीय शासनसत्ता में भेजने का सत्संकल्प लें व विभिन्न राज्यों में आमआदमीपार्टी की शासनव्यवस्था को स्थापित करें।

।। वंदे न्यायभारतम् ।।

राम गुप्ता (स्वतंत्र पत्रकार)
अति साधारण कार्यकर्ता/प्रचारक
आमआदमीपार्टी, उत्तरप्रदेश