● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
हमारे देश के ‘समाचार-चैनल’ इस सीमा तक पराधीन हो जायेंगे कि उनकी ‘सत्यनिष्ठा’ ‘अधर्म’ की श्रेणी में रेखांकित होगी, इसकी आशा भी नहीं थी। अब वे ‘अधर्म’ के चतुर्थ स्तम्भ बन चुके हैं। ऐसे मे, उनसे ‘धर्म की प्रतिष्ठा’ करने की अपेक्षा करना, न्यायसंगत नहीं होगा; क्योंकि जो छुद्र तुष्टि-हेतु अन्याय का अनुमोदन और पोषण करता है, वह त्याज्य होता है।
जो महिला-पुरुष समाचार-चैनलों मे अपने दायित्व-निर्वहन करने के लिए अनुबन्धित किये जाते हैं, उन्हें आतंकियों की तरह से अन्धभक्त के रूप में दीक्षित किया जाता है।
१- शब्द-प्रयोग और उच्चारण– ‘केहते’ हैं। आप ‘केहना’ क्या चाहते हैं? प्रयागराज में गंगा ‘बेह’ रही है। मै सोचती हूँ, ‘बट् आय काण्ट’ ऐसा नहीं कर सकती।
२- अनुशासन– यदि कोई सहभागी अँगरेज़ी मे विचार व्यक्त करेगा तो हिन्दी मे बोलने के लिए एंकर कहेगा/कहेगी। वही एंकर ‘महाभारत’, ‘हल्ला बोल’, ‘दंगल’ ‘हम तो पूछेंगे’, ‘आर-पार’ जैसे व्यर्थ के आयोजनों मे हिन्दी मे बोलते-बोलते सहभागियों पर घृणित ‘मनोवैज्ञानिक प्रभाव’ डालने के उद्देश्य से अँगरेज़ी छाँटने लगते/लगती हैं।
३- वाचाल और राक्षसी वृत्ति– जिस तरह से कुछ सूत्रधार (एंकर)– अर्नब गोस्वामी और उसके चैनल के लगभग सभी एंकर, अमीष देवांगन, रुबिया लियाकत, अंजना ओम कश्यप इत्यादिक सामाजिक, राजनीतिक आदिक विषयों पर ‘घाघ’ क़िस्म के राजनीतिक प्रवक्ताओं को जानबूझकर बुलाकर परिचर्चाओं का संचालन करते हैं, उससे सुस्पष्ट हो जाता है कि वे सभी मिलकर ‘वैचारिक प्रदूषण’ को बढ़ावा देने में होड़ लगाते दिख रहे हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जून, २०२२ ईसवी।)