राष्ट्रपति बनाम राष्ट्रपत्नी

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इधर कुछ दिनो से जिस विषय पर चर्चा-परिचर्चा की जा रही है और इस मानसून मे भी हवा गरम है, वह स्वस्थ और सकारात्मक विचारधारा को जन्म देती है। वह विषय है– किसे ‘राष्ट्रपति’ कहें और किसे ‘राष्ट्रपत्नी’, फिर क्यों कहें और क्यों न कहें?— यह भी उपप्रश्नात्मक पिछलग्गू लटका हुआ है।

हम इसे अनेक प्रकार से सिद्ध करेंगे– दोनो शुद्ध और उपयुक्त प्रयोग हैं और दोनो ही अशुद्ध और अनुपयुक्त प्रयोग हैं। कैसे? ध्यानपूर्वक समझें।

एक भाषाविज्ञानी और वैयाकरण (व्याकरण का ज्ञाता) जब ‘राष्ट्रपति’ और ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्दों पर तथ्य और तर्क के साथ विचार करता है तब वह दोनों ही व्यवहार को शुद्ध मानता है और अपने उसी विचार को खण्डित भी करता है; क्योंकि वह वैसा न कर पाने के कारण अपने कर्त्तव्य और कर्म के साथ न्याय नहीं कर पाता।

सभी जानते हैं कि ‘पति’ का विरोधी /विलोम/प्रतिलोम /विपरीतार्थक/विपर्यायबोधक शब्द ‘पत्नी’ है, इसलिए पुरुष के लिए ‘पति’ और ‘महिला’ के लिए ‘पत्नी’ का प्रयोग कहीं से भी अनुचित नहीं है; किन्तु इनका प्रयोग एक-दूसरे (पुरुष-महिला) के समानार्थक रूप मे कदापि नहीं होगा; ऐसा इसलिए कि पुरुष कब ‘पति’ कहलायेगा और महिला कब ‘पत्नी’ कहलायेगी, इसके लिए निर्धारित विधान और संस्कार हैं। आप यदि भाषाविज्ञान और व्याकरण के नियमों के आधार पर (लिंग-विचार से) “डंके की चोट पर” किसी पुरुष के राष्ट्रपति-पद ग्रहण करने के अनन्तर उसे ‘राष्ट्रपति’ कह सकते हैं तो किसी महिला-द्वारा राष्ट्र के शीर्षस्थ पद ग्रहण करने के पश्चात् निस्सन्देह, उसे ‘राष्ट्रपत्नी’ कह सकते हैं। यहाँ पर किसी भी प्रकार का विवाद उत्पन्न किया-कराया जाता है तो वह ‘मूर्खता’ की श्रेणी के अन्तर्गत देखा और समझा जायेगा।

उपर्युक्त (‘उपरोक्त’ अशुद्ध है।) अनुच्छेद का निष्कर्ष यह है कि उक्त शब्द-विश्लेषण के आधार पर पुरुष ‘राष्ट्रपति’ कहलायेगा और महिला ‘राष्ट्रपत्नी’। इसी प्रकार पुरुष ‘प्रधानमन्त्री’ और महिला ‘प्रधानमन्त्राणी’ कहलायेगी। यही नियम उपराष्ट्रपति, मुख्यमन्त्री आदिक के साथ लागू होता है।

अब उस मूल विषय पर आते हैं, जिस ओर अभी तक किसी का भी ध्यान केन्द्रित नहीं हो पा रहा है और वह है, ‘राष्ट्रपति’ शब्द का लज्जास्पद और हास्यास्पद प्रयोग। यहाँ भी हमने भाषाविज्ञान और व्याकरण को मानक स्तम्भ के रूप मे उसकी जीवन्तता को उपस्थित किया है। अब यहाँ हम एक-एक शब्द के अंग और प्रत्यंग का अनावरण आरम्भ कर दिया है।

हम पहले ‘राष्ट्र’ शब्द पर विचार करते हैं। ‘राष्ट्र’ शब्द ‘राज्’ धातु का शब्द है। इसी धातु मे ‘ष्ट्रन्’ प्रत्यय के जुड़ते ही ‘राष्ट्र’ शब्द का सर्जन (‘सृजन’ अशुद्ध है।) होता है। लोग ‘राष्ट्र’ का प्रयोग तो करते हैं; परन्तु अधिकतर जन न तो ‘राष्ट्र’ की परिभाषा जानते हैं और न ही उन्हें ‘राष्ट्र-अवधारणा’ की समझ है। किसी निश्चित और क्षेत्र-विशेष मे रहनेवाले जन, जिनकी एक भाषा, एक-से रीति-रिवाज़ तथा एक-सी विचारधारा हो, ‘राष्ट्र’ कहलाते हैं। इस ‘जन’ (लोग) मे स्त्री-समाज का प्रतिनिधित्व है और पुरुष-समाज का भी। इसी ‘राष्ट्र’ के साथ जुड़ा हुआ ‘पति’ शब्द है, जो ‘स्वामी’ के अर्थ मे प्रयुक्त होता आया है; किन्तु ‘राष्ट्र’ के साथ जो ‘पति’ शब्द जुड़ा हुआ है, उसका अर्थ ‘अधिपति’ है, जो अधिकृत (अधिकारपूर्वक) पति है; अर्थात् उसे ‘विधि-द्वारा’ पति बने रहने का अधिकार प्राप्त है। यह पति ‘पति-पत्नी’ युगलवाले सामाजिक अर्थ से परे का विषय है।

अब हम अपने इसी तथ्य और तर्क की भाषाविज्ञान और व्याकरण की धारदार ब्लेड से शल्यचिकित्सा करते हैं। इस समाज मे नारीवर्ग है और पुरुष-वर्ग भी। ऐसी स्थिति मे, ‘राष्ट्रपति’ शब्द तो मात्र ‘पुरुषवर्ग’ का प्रतिनिधित्व करता लग रहा है; बेचारा ‘नारीवर्ग’ कहाँ जायेगा?

तो उत्तर यहाँ है, कोई भी पदनाम सदैव ‘पुंल्लिंग’ के नियम के अन्तर्गत प्रयुक्त किया जाता है, जिसमे स्त्रीलिंग का भी समावेश है; ठीक अर्द्धनारीश्वर-चरित्र की तरह से :– शंकर पुरुष हैं; परन्तु आधे भाग पर ‘शिव’ का अधिकार है तो आधे भाग पर ‘शिवा’ का, जो एक-दूसरे के पूरक हैं, फिर भी पुंल्लिंग के रूप मे ही ‘शंकर’ को मान्यता मिली है। ठीक यही स्थिति पदनाम ‘राष्ट्रपति’ के साथ भी है। यदि पदनाम-व्यवहार मे कठिनाई हो रही हो तो पदनाम को पुंल्लिंग और स्त्रीलिंग के अनुसार ढाल दिया जाये, इसमे कोई बुराई नहीं है। इससे इस संदेश की समाप्ति भी हो जायेगी कि सभी ‘पदनामो’ पर पुरुषवर्ग का ही आधिपत्य है।

अब इसके संवैधानिक शब्द-प्रयोग पर विचार करते हैं। भारत का संविधान अँगरेज़ी-भाषा मे लिखा गया था और वह मौलिक नहीं है। भारत का संविधान २६ नवम्बर, १९४९ ई० से इस कहावत को विधिवत् चरितार्थ करता हुआ (जब इसे पारित किया गया था।) देश-काल-परिस्थिति-पात्र को हास्यास्पद बनाता आ रहा है, “कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा-भानुमती ने कुनबा जोड़ा”।

आप सभी को ज्ञात रहना चाहिए कि भारत के संविधान का नाम ‘द काँस्टिट्यूशन ऑव़ इण्डिया’ है; ‘भारत का संविधान’ नहीं, जिसमे कहीं पर भी ‘राष्ट्रपति’ शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है; उल्लेख है तो ‘प्रेसीडेण्ट’ का। इसी ‘प्रेसी’ के ‘डेण्ट’ मे न तो कोई ‘पति’ है और न ही ‘पत्नी’, फिर ‘प्रेसीडेण्ट’ का अर्थ ‘अध्यक्ष’ होता है, न कि ‘राष्ट्रपति’। जिस किसी ने भी प्रेसीडेण्ट शब्द का हास्यास्पद और लज्जाजनक प्रयोग ‘राष्ट्रपति’ के नाम से किया है, वह जड़ बुद्धि का व्यक्ति रहा होगा। ऐसा इसलिए कि उसे करना ही था तो ‘राष्ट्राध्यक्ष’ का करता। इस प्रकार पुरुष राष्ट्राध्यक्ष होता और नारी राष्ट्राध्यक्षा होती। नाम-परिवर्त्तन करने मे दक्ष ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ने हमारे प्राचीन इतिहास के साथ बलप्रयोग करते हुए, बड़ी संख्या मे स्थानो के नाम बदल ही दिये हैं; राजचिह्न के स्वरूप को बदल ही दिया है; राष्ट्रध्वज के वस्त्र को भी बदलने ही जा रही है तो यह भी कर ले– राष्ट्रपति के स्थान पर ‘राष्ट्राध्यक्ष’। उसका यह कृत्य सराहनीय माना जायेगा।

‘राष्ट्रपति’ प्रयोग करने से एक भाषावैज्ञानिक और व्याकरणिक विवाद यह भी उत्पन्न हो सकता है कि राष्ट्र मे सिर्फ़ ‘महिलाएँ’ नहीं हैं, ‘पुरुष’ भी हैं, इसलिए ‘राष्ट्रपति’ शब्द-प्रचलन का कोई औचित्य ही नहीं है।

यहाँ हमने उन सभी प्रबुद्धजन की शंका का समाधान कर दिया है, जो ‘राष्ट्रपति’ और ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्दों के विपक्षधर हैं और पक्षधर भी। आप सभी अपने-अपने बोधपटल/बोध-पटल (‘बोध पटल’ अशुद्ध है।) पर यहाँ किये गये शब्दविश्लेषण को लायें और विचार करने (‘विचारने’ अशुद्ध है।) के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचें कि आप कहाँ तक ग़लत हैं और कहाँ तक सही।

हमारा निष्कर्ष–
● किसी भी पदनाम को किसी लिंग-विशेष के साथ न बाँधा जायें। अब इस भ्रामक व्यवस्था को समाप्त किया जाये।
● ‘राष्ट्रपति’ शब्द के स्थान पर पुरुष-वर्ग के लिए ‘राष्ट्राध्यक्ष’/’राष्ट्र-अध्यक्ष’ (‘राष्ट्र अध्यक्ष’ और ‘राष्ट्रअध्यक्ष’ अशुद्ध हैं।) और नारी-वर्ग के लिए ‘राष्ट्राध्यक्षा’/’राष्ट्र-अध्यक्षा’ शब्द-व्यवहार को मान्यता दी जाये।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० जुलाई, २०२२ ईसवी।)