क्या मेरी भी कोई बारी आएगी

वो अपना, अपना ही रहा, 
सब हार गई …..
थी पराई वो,
किससे कहती कितना कहती,
अब अपनों से कैसे लड़ाई हो।

अरमान संजोकर स्वप्नलोक के,
हर रीत थी वहां निभाई तो,
टुकड़ो को जोड़ती रही सदा,
पर दी न कभी दिखाई वो,

ख़्वाहिशों के मोड़ जो राह तकें,
टकटकी उन्ही पर लगाए तो ,
पर ठिठक ठिठक वो सहम उठे,
कि कुछ कमी न कहीं रह जाए जो,

वो चाय के प्याले संग देती,
नेह भरी मुस्कानें जो,
पर होड़ में खुश करने को सबको
सपनों की बाजी लगाई ज्यों………

सपनों की बाजी हार गई वो,
हँसते-हँसते थक गई वो,
अपनों की ख़ुशी में खुद को ढूँढते-ढूँढते,
खुद को ही भूल गई वो।

रातें अब भी जागती हैं उसके साथ,
तारों से करती है बातें,
पूछती है — क्या मेरी भी कोई बारी आएगी?
या बस दूँगी मैं सबको राहें?

शायद जवाब है खामोशी में छिपा,
शायद वही उसकी नियति है,
खुद को मिटाकर दूसरों को संवारना,
यही तो उसकी कविता है।

आज भी वो चाय बनाती है,
मुस्कान बाँटती है चुपके से,
पर अब वो जानती है धीरे-धीरे,
अपने लिए भी जीना ज़रूरी है।