सहमी दिल्ली का अपराधी कौन?

मैं दक्षिणी दिल्ली में रहता हूँ। देश की राजधानी दिल्ली के सबसे पॉश माने जाने वाले इसी ‘दक्षिणी दिल्ली’ में इस हफ्ते दो बड़ी दुर्घटनाएं घटी।

पहली साकेत में एक पांच मंजिला इमारत भरभराकर ढह गई। कई किशोर और युवा छात्र जो मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने आये थे, काल-कवलित हो गए। जिन इंजीनियरों को भविष्य में भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना था, बड़े-बड़े पुल और इमारतें बनानी थी, वह खुद एक भृष्ट और लालची व्यवस्था के नीचे दब गए- उनका शरीर भी और सपने भी। उनके साथ ही उनके मां-बाप के तमाम सपने और ख्वाब भी उसी इमारत के मलबे के नीचे दब गए।

जिन भविष्य के चिकित्सकों को सफेद कोट पहनना था, गले में स्टेथोस्कोप पहनना था। दुनिया भर के मरीजों का इलाज करना था, उनकी जान बचानी थी। वे बेचारे खुद बेमौत मारे गए। कहाँ तो उन्हें लोगों को जीवनदान देना था और कहां वे अपना ही जीवन गंवा बैठे।

कल मालवीय नगर के एक होटल में आग लगी। रिपोर्ट बताती हैं कि होटल बनाने के लिए छह कमरे की परमिशन थी, लेकिन 24 बने हुए थे। मतलब एक चौथाई सफेद में तीन चौथाई कालिख घोली गई थी। दाल में काला नहीं था बल्कि पूरी दाल ही काली थी। होटल में केवल एक गेट था। एन्ट्री-एग्जिट सब वहीं से। आग लगी तो वह भी बंद हो गया। होटल की सारी खिड़कियां सील थी। एक बार बेसमेंट में आग लगी तो न धुंवा बाहर निकल पाया, न लोग। कुछ लोग खिड़कियों का कांच तोड़ नीचे कूद गए। तब उनकी जान बची, वह भी आधी-अधूरी। किसी के हाथ-पैर टूट गए तो किसी की रीढ़ की हड्डी।

अब होना तो यह चाहिए था कि अवैध निर्माण करने वालों, उस्की परमिशन देने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। ऐसी कि जो नजीर बने। ऐसी कि जैसी यूपी में अपराधियों और गैंगस्टरों पर होती है। उनको तो सजा मिले ही, उनकी संपत्ति पर भी बुलडोजर चले और उसका लाइव प्रसारण भी हो नेशनल चैनल पर। ताकि सनद रहे वर्षों तक, दशकों तक, सदियों तक। कोई विक्टिम कार्ड न चलने दिया जाए, न कोई नेता जाति, मजहब देखकर कार्रवाई करने या न करने की मांग करें।

लेकिन असल में होगा क्या?

होगा यह कि विपक्षी दल इसमें वर्तमान सरकार को दोष देंगे और वर्तमान सरकार पेपर निकाल के सबूत दे देगी कि परमिशन उनके पहले वाली सरकार में मिली थी। हालांकि जनता का तात्कालिक गुस्सा और मीडिया का शोर शांत करने के लिए मकान मालिक, होटल मालिक को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। एमसीडी, दिल्ली पुलिस के कुछ छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर दिया जाएगा। फिर कुछ दिन बाद मकान मालिक, होटल मालिक न्यायालय में सेटिंग करके छूट जाएंगे। एमसीडी, दिल्ली पुलिस के कर्मचारी भी धीरे से, बैक डोर से बहाल हो जाएंगे। आगे से उस क्षेत्र और बाकी दिल्ली में भी अवैध निर्माण की अनुमति का रेट बढ़ जाएगा। यह भय दिखाकर और तर्क देकर कि ऊपर तक खिलाना पड़ता है।

फिर सब कुछ वैसा ही चलने लगेगा, जैसा चल रहा है। लोग भूल जाएंगे और मान लेंगे की दिल्ली जैसे बड़े शहरों में ऐसी छोटी मोटी घटनायें घटती रहती है।

यही लोकतंत्र है। यही हमारी नियति है।

नोट-सहमत हैं तो शेयर करें। असहमत हैं तो कारण लिखने की कृपा करें।

—विनय सिंह बैस (दिल्ली के तथाकथित पॉश क्षेत्र के निवासी)