● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
इस विमूढ व्यक्ति की बातें सुने और जो लिखे हुए दिख रहे हैं, उन्हें भी पढ़ें। यह स्कूल को ‘कॉलेज’ और कॉलेज को ‘महाविद्यालय’ बता रहा है। अब इससे प्रश्न करें– ‘पाठशाला’ को अँगरेज़ी मे और ‘डिग्री कॉलेज’ को हिन्दी मे क्या कहा जाता है? यह ‘भाषा’ का उच्चारण ‘भाशा’ कर रहा है और ‘रेडियो’ की हिन्दी ‘आकाशवाणी’ बता रहा है। इस तरह टी० ह्वी०’ दूरदर्शन हो गया। यह ‘मां-आंटी’ लिखता है, क्योंकि इसे ‘चाची’ शब्द की समझ नहीं है। सुधीर चौधरी फ़र्क़, ‘क़त्ल’, ‘क़ानून’ तथा ‘क़लम’, ‘क़ैदी’, ‘ग़रीब’ आदिक को नुक़्त:रहित करके लिख रहा है, जो कि निरर्थक हैं। यह ‘रामायण’ को ‘रामायड़’, ‘सम्स्कृत’ को ‘सन्स्कृत्’, ‘सम्स्कारों’ को ‘सन्स्कारों’, ‘अमीर खुसरो’ को ‘आमीर खुसरो’, ‘विषय’ को ‘विशय’ पढ़ रहा है। यह बहुरुपिया देखने मे तो सुन्दर है; परन्तु इसका भाषाबोध विकृत है।
अफ़्सोस है! ऐसे बहुरुपिये आज अपनी मूर्खता का परिचय प्रस्तुत करते हुए, लाखों रुपये कमा रहे हैं।
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