मै १७ अक्तूबर, २०२२ ई० को उत्तरप्रदेश के एक विश्वविद्यालय मे ‘पत्रकारिता एवं जनसंचार-विषय’ मे अध्यापन करने के लिए ‘एसोशिएट प्रोफ़ेसर’ और ‘असिस्टेण्ट प्रोफ़ेसर’-पद के चयन-हेतु ‘विशेषज्ञ’ के रूप मे आमन्त्रित किया गया था। कुल १५ अभ्यर्थी- अभ्यर्थिनियों ने आवेदनपत्र भेजे थे, जिनमे से ८ की ही उपस्थिति रही। वे दिल्ली, कानपुर, वाराणसी, ग़ाज़ीपुर, भोपाल, बलिया तथा प्रयागराज के थे। चयन-समिति मे कुलपति-सहित कुल छ: सदस्य थे, जिनमे से तीन बाह्य (यहाँ ‘वाह्य’ अशुद्ध है।) परीक्षक थे और तीन अन्त:।
अधिकतर अभ्यर्थिनी-अभ्यर्थी पत्रकारिता एवं जनसंचार-विषय से सम्बन्धित प्रश्नो के संतोषप्रद उत्तर नहीं दे सके थे; सभी मौखिक और लिखित स्तर पर अशुद्ध शब्द-व्यवहार कर रहे थे। उनमे से कोई भी हिन्दी-अँगरेज़ी मे ‘Ph. D.’ का शुद्ध लेखन नहीं कर सका था।
मैने एक अभ्यर्थी से ‘जनसम्पर्क’/’जनसंपर्क’ लिखने के लिए कहा तब उसने ‘स’ के ऊपर गोला ० लगाते हुए लिखा था– जन सर्पक। उससे कहा, “ग़लत लिखा है, शुद्ध लिखो” तब उसने सम्पर्क लिखते हुए अर्द्धाक्षर ‘म्’ के ऊपर रेफ लगाकर लिख दिया था। जब एक अभ्यर्थिनी का ‘इण्टरनेशनल कम्युनिकेशन’ पर मौखिक- लिखित’ परीक्षण किया जा रहा था तब वह वर्तनी अँगरेज़ी मे लिख रही थी। मैने उससे ‘इण्टरनेशनल’ की हिन्दी लिखने के लिए कहा था तब उसने लिखा था– ‘अन्तर्राष्ट्रिय’। जब मैने उसे बताया कि ग़लत लिखा है तब उसने उसी मे ‘गोचपोच’ करते हुए ‘अन् र्तराष्ट्रीय’ लिखा था।
एक विचित्र अभ्यर्थी उपस्थित हुआ था। वह मस्तक पर लम्बाई-चौड़ाई-गहराई मे चन्दन-टीका लपेटे हुए था। वह अपने को किसी समाचारपत्र के ‘डेस्क’ पर ३ वर्षों तक काम करने का अनुभवी बता रहा था। उससे कुलपति ने ‘सोसल मीडिया से सम्बन्धित कुछ प्रश्न किये थे। मैने पूछा, “इसे सोसल मीडिया’ क्यों कहते हैं?” उस तिलकधारी ने उत्तर दिया, ”इसमे समाज की बुराइयों को बताया जाता है।” मेरा प्रतिप्रश्न था, “समाचारपत्रों मे भी तो ‘सामाजिक बुराइयों’ का प्रकाशन होता है, फिर दोनो मे किस प्रकार का अन्तर है?” वह ‘पट्ठा’ अपनी ही जोते जा रहा था। वह संस्कृत का भी विद्यार्थी था; मैने प्रश्न किया, ‘सम्सकृत’ शुद्ध है अथवा ‘सन्स्कृत’? उसका उत्तर था, “सन्स्कृत’ शुद्ध है।” तभी एक परीक्षक, जो संस्कृत के प्राध्यापक थे, ने प्रश्न किया, “स्वर किसे कहते हैं?” वह उत्तर नहीं दे सका। मैने कहा ”कवर्ग’ को सुनाइए।” वह अशुद्ध उच्चारण करता रहा। मैने पूछा, “अक्षर की रचना कैसे होती है?” नहीं बता सका।
एक शोधार्थी ने अपना शोधकर्म प्रस्तुत किया था, जिसमे ‘शोधार्थी : क ख ग’ (शोधार्थी का नाम) मुद्रित था। मेरा प्रश्न था, “शोधार्थी’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?” वह बताने मे असमर्थ रहा।
मैने एक अभ्यर्थी से जब कहा, “समझ लीजिए, आपके सामने हम सभी विद्यार्थी के रूप मे बैठे हैं और हममे एक विद्यार्थी प्रश्न करता है, “कृपया पत्रकारिता का इतिहास समझा दीजिए।” उस अभ्यर्थी ने कहा, “मुझे इसका इतिहास नहीं मालूम।”
किसी भी अभ्यर्थी-अभ्यर्थिनी ने मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, “समाचार और संवाद मे क्या अन्तर है?” जिन्होंने भी अपने शोधकर्म दिखाये थे, उनके आवरणपृष्ठ पर शोध का विषय ऐसे लिखा हुआ था, “पत्रकारिता का का मूल्य और गुणधर्म” (विषय काल्पनिक है।) मैने पूछा शोधविषय को जिस चिह्न को लगाकर लिखा गया है, उसे क्या कहते हैं? इस चिह्न को कहाँ लगाया जाता है और किसलिए लगाया जाता है? अभ्यर्थिनी-अभ्यर्थी ये बताने मे असमर्थ रहे।
मैने एक से पूछा था, “फालो मोर’, ‘मोर टु फॉलो’ क्या होता है? उत्तर नहीं मिला। एक अन्य अभ्यर्थी से प्रश्न किया था, “लैंग्विज़’ के अर्थ मे न लेकर, यह बताइए– पत्रकारिता मे ‘भाषा’ क्या है? अभ्यर्थी निरुत्तर रहा। भारत के प्रथम समाचारपत्र का नाम दो अभ्यर्थी ही बता पाये थे। एक अभ्यर्थिनी से प्रश्न किया था, “भारत के प्रथम समाचारपत्र का नाम क्या था?” उसका उत्तर था, “उदन्त मार्त्तण्ड”। मैने कहा, “प्रश्न को पहले समझें, फिर उत्तर दें।” वह ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ की रट लगाती रही। मैने कहा, “उदन्त मार्त्तण्ड लिखकर दिखायें।” उसने लिखा था, ‘उदंत मार्तंड’। मैने उसका अर्थ पूछा था। वह न बता सकी। मैने जब ‘उदन्त’ का अर्थ पूछा तब उसने ‘सुबह’ कहा। मैने उसी से पूछा, “सुधावर्षण’ क्या है?” वह बताने मे असमर्थ रही।
एक अभ्यर्थी रेडियो-टी० ह्वी०-पत्रकारिता के विषय मे बता रहा था; उसी से मैने प्रश्न किया था, “प्रसार भारती का किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कब गठन किया गया था?” वह नहीं बता सका।
एक अभ्यर्थिनी ने हिन्दी मे कुल स्वरों की संख्या पाँच और कुल वर्णमाला की संख्या छब्बीस बतायी थी। वह न तो पाँच स्वर सुना सकी और न ही छब्बीस वर्णमाला।
अधिकतर अभ्यर्थिनी-अभ्यर्थी संस्कारविहीन थे; नमनशीलता से रहित थे। वे कक्ष मे प्रवेश करने के बाद अभिवादन करने और बैठने की अनुमति लेने की आवश्यकता ही नहीं समझते थे; जो अभिवादन कर भी रहे थे तो लग रहा था, मानो अभिवादन-शैली मे स्वयं को प्रस्तुत करते समय कोई पापकर्म करने के लिए उद्यत हो रहे हों। इतना ही नहीं, अधिकतर परीक्षण-अनन्तर जाते समय अभिवादनरहित दिख रहे थे।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अक्तूबर, २०२२ ईसवी।)