-”पावस देखि रहीम मन कोइल साधै मौन”
शब्द-विचार– पावस
‘पावस’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत-भाषा के शब्द ‘प्रावृष्’ से हुई है। ‘प्रावृष्’ शब्दभेद की दृष्टि से विकारी शब्दान्तर्गत संज्ञा-शब्द है तथा यह लिंगप्रकारानुसार स्त्रीलिंग के अन्तर्गत आता है। प्रावृष् ‘वृष्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘सिंचन करना’/ ‘सीँचना’ होता है। वृष् धातु के पूर्व मे ‘प्र’ उपसर्ग लगा हुआ है, जिसका यहाँ अर्थ ‘उत्तम प्रकार से’/ ‘प्रकृष्ट रूप से’/ ‘अच्छी तरह से’ है। इस धातु के अन्त मे जैसे ही ‘क्विप्’ प्रत्यय जुड़ता है, यह दीर्घ होकर ‘प्रावृष्’ का रूप धारण कर लेता है। इस प्रावृष् शब्द का अर्थ ‘वर्षाऋतु’ है। इसी प्रावृष् शब्द मे ‘टाप्’ प्रत्यय को जोड़कर एक अन्य स्त्रीलिंग-शब्द ‘प्रावृषा’ की रचना होती है। इसका भी अर्थ ‘वर्षाऋतु’/’वर्षा-ऋतु’/’वर्षा की ऋतु’ है। एक अन्य शब्द ‘प्रवर्ष’ भी है, जो संस्कृत-भाषा का संज्ञा-शब्द है और वह पुंल्लिंग के अन्तर्गत आता है। वह ‘वृष्’ (सींचना) धातु का शब्द है, जिसके पहले ‘अच्छी प्रकार से’ के अर्थ मे ‘प्र’ उपसर्ग लगा है। इस धातु के अन्त मे ‘अच्’ प्रत्यय के जुड़ाव से ‘प्रवर्ष’ का सर्जन होता है। इसके समानार्थी शब्द हैँ :– बारिश, वर्षा, वृष्टि इत्यादिक। इसके भिन्नार्थक शब्द हैँ :– बादल; बारह मासवाला एक कालमान; संवत्सर आदिक।
अब हम अपने मूल शब्द ‘पावस’ पर विचार करते हैँ, जो कि शब्दभेद के विचार से संज्ञा-शब्द है तथा लिंगप्रकारानुसार ‘पुंल्लिंग’ का शब्द। पावस के समानार्थी शब्द हैँ :– वर्षाऋतु, वर्षाकाल, बरसात इत्यादिक। इसके भिन्नार्थक शब्द हैँ :– वर्षा; समुद्र की ओर से आनेवाली वर्षासूचक हवा (मानसून) आदिक। इसे प्राकृत-भाषा मे ‘पाउस’ कहते हैँ। गोस्वामी तुलसीदास ‘श्री रामचरितमानस’ के माध्यम से कहते हैँ :–
“तुलसी पावस के समय धरी कोकिला मौन।
अब तो दादुर बोलिहैं हमैं पूछिह कौन।।”
कुछ इसी भाव को रहीमदास इस प्रकार से व्यक्त करते हैँ:– “पावस देखि रहीम मन कोइल साधै मौन।
अब दादुर बक्ता भये हमैं पूछै कौन।।”
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २९ जुलाई, २०२५ ईसवी।)