● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
बीभत्स चरित्रधारी!
तुम्हारा चेहरा
आज दल-परिवर्त्तन करता-सा दिख रहा है।
तुम्हारी अतिरिक्त महत्त्वाकांक्षा के कुकृत्य,
पैवन्द लगीँ चादरेँ सुना रही हैँ।
लोलुपता, लिप्सा और क्लीव-मनोवृत्ति–
तुम्हारे चरित्र की पटकथा को
आमिषाशी बना रही हैँ।
तुम निष्ठुर और नृशंस बन चुके हो;
तुम्हारे भीतर का नितान्त निर्दय-निकृष्ट जीव,
तुम्हेँ पापजीवी बनाने की कला मे–
शिक्षित-दीक्षित-निपुण कर चुका है।
तुम जीवन-मृत्यु के मध्य
समीकरण बनाने की कला–
सीखकर भी सीख न पाये;
क्योँकि ‘परख’ और ‘परस’ को
तुमने दो समानान्तर रेखाओँ मे बाँटकर देखे हैँ।
स्वर मे माधुर्य का अनुलेपन;
मन-मस्तिष्क मे
विषाक्त षड्यन्त्र का प्रासाद निर्मित कर,
तुमने जो भूल की है,
समय-शिला पर–
पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त का अनुभव
तुम्हेँ ही करना है,
जहाँ से तुम्हारा पलायन
निर्विकल्प सिद्ध होता लक्षित होगा
और तुम,
अतीत को सहलाते-सहलाते
एक असाध्य रोग का पर्याय बन जाओगे।
मत भूल!
शरीर के मरने से पहले
तू अपनी पहली मृत्यु का भागी बन चुका है,
जहाँ तेरी सोच-समझ मर चुकी है।
अपना चेहरा देखता रहता है;
रोगशैया पर पड़ा रहता है।
तेरे अंग-प्रत्यंग को छेदतीँ मक्खियाँ,
जब तेरे कानो से सटकर–
तुझसे तेरे अतीत का हिसाब माँगती हैँ
तब तू अपाहिज़ बना,
आकाश की ओर देखता रह जाता है।
——————–
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ३० जुलाई, २०२५ ईसवी।)