‘विश्वमहिला-दिवस’ पर ‘सर्जनपीठ’ का विशेष आयोजन
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प्रयागराज। प्रतिवर्ष ‘विश्व महिला-दिवस’ का आयोजन होता है और उसके लिए अलग-अलग विषय भी निर्धारण किये जाते हैँ; परन्तु खेद का विषय है! किसी विषय का कोई क्रियान्वयन् नहीँ किया जाता। इस वर्ष का विषय रखा गया है– ‘गिव टु गेन’। यह विषय सारगर्भित है, जिसका आशय है कि जब हम दूसरोँ को सहारा देते हैँ तब पूरी मानवता का लाभ होता है। इसका भावार्थ है– महिलाओँ और लड़कियोँ को विकासपथ पर ले जाने के लिए संसाधन, ज्ञान और अवसर का आदान-प्रदान करना।
उपर्युक्त संदर्भ से जोड़ते हुए, ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से ‘विश्वमहिला-दिवस’ की पूर्व-संध्या मे ‘कब तक छली जाती रहेँगी, महिलाएँ’ विषय पर एक विचारोत्तेजक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।
सोलन (हिमाचलप्रदेश) से प्रो० फ़हमिदा ख़ातून ने बताया– विश्व महिला-दिवस का आयोजन ऐसे समय मे किया जायेगा, जब न्याय-व्यवस्था दबाव मे है; संघर्ष, दमन और राजनीतिक तनाव क़ानून के शासन को कमज़ोर करते आ रहे हैँ।”
सूरत (गुजरात) से साहित्यकार डॉ० दिविशा मज़ूमदार ने कहा– इस दिवस को महिला-पुरुष मना तो लेते हैँ; परन्तु इस दिवस के निर्धारण के पीछे के मूल कारण से अनभिज्ञ रहते हैँ। आज भी देश मे एक चार साल की बच्ची से लेकर वयोवृद्धा तक सुरक्षित नहीँ है। जिसके हाथ मे लाठी है, उसी का दबदबा दिख रहा है।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से अवगत कराया– वास्तव मे, इसके पीछे वर्ष १९०८ की वह संघर्ष-व्यथा-कथा है, जब १५ हज़ार महिलाओँ ने काम के घण्टे कम करने और अत्युत्तम वेतन और मतदान का अधिकार पाने के लिए न्यूयॉर्क मे वर्ष १९०८ मे आन्दोलन किया था, जिसका परिणाम रहा कि वर्ष १९१० मे कोपेनहेगन (डेनमार्क) के एक विश्व-सम्मेलन मे जर्मन की प्रतिनिधि क्लारा जेटकिन के प्रतिवर्ष 'विश्वमहिला-दिवस-आयोजन' कराने के एक प्रस्ताव को सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया था, तब 'राइट्स जस्टिस, एक्शन फॉर ऑल वीमन ऐण्ड गर्ल्स' विषय निर्धारित किया गया था, जिसका आशय है कि जबतक महिलाओँ को न्याय नहीँ मिलेगा तबतक उनके अधिकार केवल शब्द बनकर रह जायेँगे। तब से अब तक महिलाओँ की कमोवेश वही स्थिति बनी हुई है।
प्रयागराज से कवि शान्तनु भदौरिया ने कहा– हमारा समाज अपने भाव-विचार, वक्तव्य, लेखनादिक मे जिन महिलाओँ की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक उपलब्धि को गिनाते हुए, अपनी पीठ ठोँकता आ रहा है, वह मात्र एक छलावा है।
फ़रीदाबाद (हरियाणा) से सामाजिक कार्यकर्त्री अंजुम वीर ने बताया– हम लैंगिक समानता की बातेँ तो बहुत करते आ रहे हैँ; परन्तु जब उसे हक़ीक़त के आईने मे देखते हैँ तब सच्चाई सामने आती है। वह सच्चाई है– भारत मे महिलाएँ पूरी तरह से असुरक्षित हैँ।