रैन-बसेरा, अल्लापुर में होली-कविसम्मेलन
प्रयागराज। गत दिवस होलिकोत्सव के अवसर पर व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की अध्यक्षता मे प्रयागराज की कवि-कवयित्रियों ने रैन-बसेरा, बाघम्बरी गृह-योजना, अल्लापुर, प्रयागराज मे अपनी-अपनी रंग-विरंगभरी कविताओँ से वातावरण को सतरंगी बना दिया था। आचार्य ने अपने दोहे सुनाये– देवर-भाभी में कहाँ, भला दिखे अनुराग। बाहर-बाहर प्रेम है, भीतर-भीतर आग।।
चर्चित शाइर श्रीराम मिश्र ‘तलब जौनपुरी’ मुख्य अतिथि थे, जिन्होँने एक ग़ज़ल पेश की– जाने वफ़ा! अब आप न इतना सताइए, फागुन की है बहार, ज़रा मुसकराइए।
उर्वशी उपाध्याय ने सुनाया– टेसू-टेसू बन फाग में तन हो गया गुलाल।
हरिवंश पाण्डेय दो क़दम आगे निकल आये– तू भी रंग दे मेरी चुनरिया, रह न जाये कोरी रे।
जहाँ होली मे तन-मन रँग जाता है, वहीँ महक जौनपुरी को अपने दुपट्टे के भीग जाने की चिन्ता सता रही थी– न डालो हम पे रंग इतना, दुपट्टा भीग जायेगा।
कमलाप्रसाद गिरि ने श्रोताओँ को होलिहारन-परम्परा से जोड़ दिया था– होलिहारन करेँ फगुआ-गान, फागुन-रस घोल गयो।
वसंत और नील गगन का एक रूपक-सर्जन करते हुए, डॉ० पुष्पा श्रीवास्तव ने सुनाया– रंगोँ की रानी होली वसंती आयी, नीले अम्बर से पीली घटा छा गयी।
कवि-सम्मेलन का संचालन कर रहे शिवराम उपाध्याय ‘मुकुल मतवाला’ पर होली की खुमारी इस तरह तारी थी कि वे अपना होश गुम कर बैठे थे, फिर अपनी बीवी और साली मे अन्तर भी नहीँ कर पा रहे थे; फलत: वे सब कर बैठे, जिसकी उम्मीद किसी को नहीँ थी; क्योँकि– बीवीवाली साड़ी एक दिन साली पहन गयी।
शिवराम गुप्त होली का अभिनन्दन अपने दार्शनिक अन्दाज़ में करते दिखे थे।
कमल नारायण शुक्ल को वातावरण मे होली की मादकता का अनुभव हो रहा था– चारोँ ओर नशा छाया है, देखो फागुन आया है।
इन्द्रमणि मिश्र को कान्हा और गोपिकाओँ की होली का स्मरण हो आया– सिर बाँधै मुकुट, खेलैँ होरी।
इस अवसर पर सजग श्रोता के रूप मे दिवाकर पहाड़िया, काशी रत्नेश्वर दयाल त्रिपाठी इत्यादिक रसिकजन की वाहवाही करने की अदाएँ देखते ही बन रही थीँ।