डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव
वह रात साधारण नहीं थी। मथुरा का कारागार अंधकार में डूबा था। बाहर वर्षा अपने प्रचंड वेग में थी। यमुना उफन रही थी। सत्ता के सिंहासन पर बैठा कंस अपने ही भय से काँप रहा था। और उसी रात, जब चारों ओर अंधकार का साम्राज्य था, एक शिशु ने जन्म लिया—जिसने आने वाले युगों को यह विश्वास दिया कि अंधकार चाहे कितना भी घना हो, प्रकाश का जन्म रोका नहीं जा सकता।
वह शिशु कृष्ण था।
कृष्ण का जन्म केवल एक धार्मिक घटना नहीं है। यह भारतीय सभ्यता की स्मृति में अंकित वह महान प्रतीक है, जिसमें संकट के बीच संभावना, निराशा के बीच आशा और अधर्म के बीच धर्म के पुनर्जागरण का संदेश छिपा है।
इसीलिए कृष्ण को केवल मंदिर की मूर्ति, कथा के नायक या पुराणों के देवता के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा कर देना है।
कृष्ण एक दृष्टि हैं। जीवन को देखने की दृष्टि।
“कृष्ण को समझना हो तो उनके किसी एक रूप को नहीं, उनके विरोधाभासों को समझना होगा।”
वही कृष्ण हैं जो वृंदावन की गलियों में माखन के लिए मटकी फोड़ते हैं और वही कृष्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन को जीवन का सबसे गंभीर दर्शन सुनाते हैं। वही कृष्ण हैं जो गोपियों के बीच प्रेम की बांसुरी बजाते हैं और वही कृष्ण अत्याचार के प्रतीक कंस का अंत करते हैं। वही कृष्ण माँ यशोदा की रस्सी से बँध जाते हैं और वही कृष्ण विराट रूप धारण कर अर्जुन को समूचे ब्रह्मांड का दर्शन करा देते हैं। वही कृष्ण युद्ध में स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प लेते हैं और वही कृष्ण ऐसी रणनीति बनाते हैं कि धर्म की विजय का मार्ग प्रशस्त हो।
कृष्ण इसलिए अद्वितीय हैं क्योंकि वे जीवन को किसी एक रंग में नहीं देखते। उनके पास बांसुरी भी है और सुदर्शन भी। प्रेम भी है और प्रतिरोध भी। करुणा भी है और कठोरता भी। वैराग्य भी है और कर्म की प्रचंड ऊर्जा भी।
कृष्ण का ‘सर्वधर्म’ : संकीर्णता से सत्य की ओर
गीता में कृष्ण का उद्घोष है—
“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।”
यह वाक्य अक्सर केवल धार्मिक अर्थ में उद्धृत किया जाता है, जबकि कृष्ण के दर्शन की गहराई इससे कहीं आगे जाती है।
यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ केवल बाहरी कर्मकांड या संप्रदाय नहीं है। कृष्ण मानो मनुष्य से कह रहे हैं—अपने भीतर के भ्रम, अहंकार, मोह और उन आग्रहों को छोड़ो, जो तुम्हें सत्य से दूर करते हैं। उस सत्य की शरण में आओ, जो तुम्हें भय से मुक्त करे।
कृष्ण का धर्म इसलिए जड़ नहीं है। वह गतिशील है। वह प्रश्न पूछता है। वह परिस्थितियों को समझता है। वह मनुष्य को केवल परंपरा का अनुयायी नहीं, बल्कि विवेकशील निर्णयकर्ता बनाता है। यही कारण है कि कृष्ण का संवाद अर्जुन के साथ किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि एक गहन बौद्धिक और आध्यात्मिक संवाद की तरह सामने आता है।
अर्जुन प्रश्न करता है। कृष्ण उत्तर देते हैं। अर्जुन फिर संशय करता है। कृष्ण फिर समझाते हैं अर्थात् कृष्ण अंध-आस्था नहीं माँगते; वे समझ के बाद समर्पण की बात करते हैं।
कुरुक्षेत्र बाहर कम, भीतर अधिक है
महाभारत का कुरुक्षेत्र केवल दो सेनाओं के बीच का मैदान नहीं है। वह मनुष्य के भीतर का मैदान भी है। हर व्यक्ति किसी न किसी क्षण अर्जुन बनता है। सामने कर्तव्य होता है और दूसरी ओर मोह। एक तरफ सत्य होता है और दूसरी तरफ सुविधा। एक ओर आत्मसम्मान होता है और दूसरी ओर भय।
अर्जुन का गांडीव इसलिए नहीं छूटा था कि वह कमजोर योद्धा था। वह इसलिए डगमगाया क्योंकि उसके सामने भावना और कर्तव्य का संघर्ष था। कृष्ण ने सबसे पहले उसके भीतर के भ्रम को संबोधित किया।
यही गीता की शक्ति है।
आज का युवा करियर और रुचि के बीच उलझता है। कोई व्यक्ति ईमानदारी और तत्काल लाभ के बीच फँसता है। कोई अधिकारी दबाव और कर्तव्य के बीच खड़ा होता है। कोई परिवार अपने प्रियजन की इच्छा और सही निर्णय के बीच असमंजस में पड़ता है।
हर जगह एक छोटा-सा कुरुक्षेत्र है और हर कुरुक्षेत्र में कृष्ण का संदेश है— निर्णय भय से नहीं, विवेक से करो।
कर्म : कृष्ण के दर्शन का मेरुदंड
कृष्ण पलायन के देवता नहीं हैं। वे कर्म के देवता हैं।
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
इस एक सूत्र ने भारतीय चिंतन को कर्म और अनासक्ति का अद्भुत संतुलन दिया। कृष्ण यह नहीं कहते कि परिणाम का कोई महत्त्व नहीं। वे कहते हैं कि परिणाम के मोह में कर्म की शुचिता न खो दो। एक चिकित्सक का धर्म है कि वह रोगी का श्रेष्ठ उपचार करे। परिणाम हमेशा उसके हाथ में नहीं होता।
एक शिक्षक का दायित्व है कि वह पूरी निष्ठा से पढ़ाए। हर विद्यार्थी समान परिणाम दे, यह उसके नियंत्रण में नहीं। एक किसान भूमि तैयार कर सकता है, बीज बो सकता है, सिंचाई कर सकता है; लेकिन बादल बरसेंगे या नहीं, यह उसके अधिकार में नहीं। फिर भी वह खेती करना नहीं छोड़ता।
यही कर्मयोग है—अधिकार प्रयास पर, अहंकार परिणाम पर नहीं।
आज की उस दुनिया में, जहाँ हर उपलब्धि को तत्काल सफलता के पैमाने पर तौला जाता है, कृष्ण का यह दर्शन मनुष्य को भीतर से स्थिर करता है।
बांसुरी वाले कृष्ण और महाकाल-रूप कृष्ण
कृष्ण के व्यक्तित्व का सबसे मोहक पक्ष उनका यह द्वंद्व है। वृंदावन में बांसुरी बजती है तो प्रेम जागता है। महारास में कृष्ण प्रेम को देह की सीमाओं से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक अनुभूति में बदल देते हैं।
लेकिन जब अधर्म सामने आता है तो वही कृष्ण कहते हैं—
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।”
सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए धर्म की स्थापना आवश्यक है। इसमें कृष्ण का एक बड़ा सामाजिक संदेश छिपा है। प्रेम का अर्थ अन्याय को सहना नहीं है। करुणा का अर्थ अत्याचार के सामने घुटने टेक देना नहीं है।
क्षमा महान है, लेकिन जहाँ क्षमा से अत्याचारी और शक्तिशाली होता जाए और निर्दोष का जीवन संकट में पड़े, वहाँ प्रतिरोध भी धर्म बन जाता है। कृष्ण इसी संतुलन के शिक्षक हैं।
यशोदा की रस्सी में बँधा विराट पुरुष
कृष्ण की सबसे सुंदर छवियों में एक है—माँ यशोदा द्वारा उन्हें बाँधना। वह बालक जिसे पूरा ब्रह्मांड अपने भीतर समेटे हुए माना जाता है, माँ की छोटी-सी रस्सी से बँध जाता है। यह केवल बाल-क्रीड़ा नहीं। यह भारतीय भक्ति की अद्भुत कल्पना है—विराट सत्ता भी प्रेम के सामने स्वयं को सीमित कर देती है। लेकिन यही कृष्ण जब अत्याचार के सामने खड़े होते हैं तो कोई बंधन उन्हें रोक नहीं पाता।
यहाँ कृष्ण का जीवन मानो कहता है— जिसे प्रेम बाँध सकता है, उसे अत्याचार नहीं बाँध सकता।
माखन से महाभारत तक
कृष्ण के चरित्र को यदि केवल गंभीर उपदेशों में खोजा जाए तो उनके व्यक्तित्व का आधा ही संसार दिखाई देगा। उनका बचपन बताता है कि जीवन में उल्लास भी चाहिए। वे माखन चुराते हैं। गोपियों से हँसी-मजाक करते हैं। माँ से डाँट खाते हैं। गाय चराते हैं। बांसुरी बजाते हैं अर्थात कृष्ण जीवन को बोझ नहीं बनने देते और फिर वही कृष्ण पूतना, बकासुर और अघासुर जैसे संकटों का सामना करते हैं।
इन कथाओं का प्रतीकात्मक अर्थ भी महत्त्वपूर्ण है—निर्दोषता और आनंद के साथ बुराई के प्रतिरोध की शक्ति। यह जीवन का संतुलन है। सिर्फ गंभीर रहना जीवन नहीं है और सिर्फ आनंद में डूबे रहना भी जीवन नहीं है। कृष्ण दोनों को साथ लेकर चलते हैं।
कृष्ण का जन्मसमय भी एक संदेश देता है
कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में होता है। घनघोर रात। कारागार। बाहर प्रचंड वर्षा। उफनती यमुना। चारों ओर संकट और उसी समय जन्म लेता है प्रकाश। इस दृश्य को केवल धार्मिक आख्यान की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं। इसमें एक महान दार्शनिक संदेश है— परिवर्तन हमेशा सुविधाजनक समय में नहीं आता।
कई बार सबसे बड़ी सुबह सबसे घनी रात के बाद आती है। जब व्यवस्था जड़ हो जाती है, जब सत्ता निरंकुश हो जाती है, जब भय समाज की चेतना पर छा जाता है—तभी परिवर्तन की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। कृष्ण का जन्म इसी आशा का प्रतीक है।
रूढ़ि नहीं, विवेक की कहानी है कृष्ण-गाथा
कृष्ण जड़ता को स्वीकार नहीं करते। गोवर्धन का प्रसंग हो या महाभारत की जटिल राजनीति, कृष्ण परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेने की शिक्षा देते हैं। वे बताते हैं कि परंपरा इसलिए सही नहीं हो जाती क्योंकि वह पुरानी है और नया इसलिए गलत नहीं हो जाता क्योंकि वह नया है।
कसौटी एक ही है— क्या वह सत्य, न्याय और लोककल्याण के पक्ष में है?
यह विचार आज के समाज के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कृष्ण हमें परंपरा का सम्मान करना सिखाते हैं, लेकिन विवेक को गिरवी रखना नहीं।
सत्ता के बाहर रहकर भी सत्ता से बड़ा बनना सिखाते हैं श्रीकृष्ण
कृष्ण स्वयं राजा बनकर नहीं, कई बार राजा बनाने वाले व्यक्तित्व के रूप में दिखाई देते हैं। वे अर्जुन के सारथी बनते हैं। यह दृश्य नेतृत्व की परिभाषा बदल देता है। जिसके हाथ में लगाम है, वह हमेशा सबसे छोटा नहीं होता। कई बार वास्तविक शक्ति उस व्यक्ति में होती है जो दिशा जानता है।
कृष्ण ने अर्जुन के हाथ से गांडीव नहीं छीना। उन्होंने अर्जुन को उसकी शक्ति का बोध कराया। यही नेतृत्व है—दूसरे को अपने ऊपर निर्भर बनाना नहीं, उसे उसकी सामर्थ्य से परिचित कराना। आज के परिवार से लेकर संस्थानों और राष्ट्र तक, नेतृत्व के इस दर्शन की आवश्यकता है।
कृष्ण ने मनुष्य को उसके भीतर का युद्ध दिखाया
कृष्ण की महानता केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने अनेक संकटों से संसार को बचाया। उनकी सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने मनुष्य को उसके भीतर चलने वाले युद्ध का नाम दिया। हम सबके भीतर भय है। मोह है। अहंकार है। लोभ है। संशय है और साथ ही विवेक भी है। साहस भी है। प्रेम भी है। कर्तव्यबोध भी है। यही हमारा कुरुक्षेत्र है। कृष्ण हमें उस युद्ध से भागना नहीं, उसे समझना सिखाते हैं।
जन्माष्टमी की सार्थकता
हर वर्ष हम कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। झाँकियाँ सजती हैं। मंदिरों में घंटियाँ बजती हैं। “नंद के आनंद भयो” की ध्वनि गूँजती है। आधी रात को जन्मोत्सव होता है। लेकिन एक प्रश्न हमारे सामने भी होना चाहिए—
क्या कृष्ण केवल मंदिर में जन्म लें या हमारे भीतर भी? इस प्रश्न का उत्तर सभी को खोजना होगा। जब तक कृष्ण को हम मन मे नहीं धारण करेंगे कभी सुख, शान्ति और उत्थान को प्राप्त नहीं होंगे।
क्या आप जानते हो कि हमारे भीतर का कंस क्या है?
अहंकार।
हमारे भीतर का दुर्योधन क्या है?
लोभ और सत्ता का मद।
हमारे भीतर का शकुनि क्या है?
छल और कुटिलता।
और हमारे भीतर का अर्जुन?
वह विवेक, जो सही और गलत को पहचानना तो चाहता है, लेकिन निर्णय के क्षण में डगमगा जाता है।
जब हम अहंकार के स्थान पर विनम्रता चुनते हैं, स्वार्थ के स्थान पर कर्तव्य, छल के स्थान पर सत्य, भय के स्थान पर साहस और घृणा के स्थान पर प्रेम चुनते हैं—तभी हमारे भीतर कृष्ण जन्म लेते हैं। कृष्ण जन्माष्टमी का सबसे बड़ा उत्सव शायद बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर होना चाहिए।
कृष्ण : एक शाश्वत संभावना
कृष्ण किसी एक युग के नहीं हैं। जब समाज में मोह बढ़ेगा—गीता की आवश्यकता होगी। जब अन्याय बढ़ेगा—कृष्ण के धर्मबोध की आवश्यकता होगी। जब मनुष्य सफलता के पीछे स्वयं को खोने लगेगा—कर्मयोग की आवश्यकता होगी। जब जीवन में प्रेम सूखने लगेगा—बांसुरी की आवश्यकता होगी। और जब अंधकार बहुत घना हो जाएगा—कृष्ण जन्म की स्मृति आशा देगी।
कृष्ण को इसलिए केवल भगवान कह देना पर्याप्त नहीं। उन्हें समझना होगा। उनके प्रश्नों को समझना होगा। उनके निर्णयों को समझना होगा। उनके कर्मयोग को जीवन में उतारना होगा। उनके प्रेम को आत्मा की भाषा बनाना होगा और उनके धर्म को न्याय तथा सत्य की कसौटी पर समझना होगा। क्योंकि कृष्ण का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि जीवन से भागकर मुक्ति नहीं मिलेगी; जीवन को सही दृष्टि से जीकर ही मनुष्य अपने भीतर के अंधकार से बाहर आ सकता है।
कृष्ण उस प्रकाश का नाम हैं जो अंधकार को नकारता नहीं—उसी अंधकार के बीच जन्म लेता है। मथुरा की वह रात बहुत पीछे छूट चुकी है। कंस का साम्राज्य इतिहास हो चुका है। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका है। लेकिन मनुष्य का भीतर का युद्ध आज भी जारी है और इसलिए कृष्ण आज भी आवश्यक हैं। आज भी प्रासंगिक हैं। आज भी जीवित हैं।
जहाँ सत्य के लिए खड़ा होने का साहस है—वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ कर्म में निष्ठा है—वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ प्रेम में पवित्रता है—वहाँ कृष्ण हैं।
जहाँ अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध है—वहाँ कृष्ण हैं।
और जहाँ घोर अंधकार में भी प्रकाश की उम्मीद बची है—वहाँ कृष्ण का जन्म हो रहा है।
कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।