डॉ० राघवेन्द्र कुमार राघव–
गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना-सा घर था—ऊँची मिट्टी की दीवारें, बीच में नीम का पेड़ और आँगन में वह चबूतरा, जिस पर बैठकर रामदीन अपने चारों बच्चों को शाम को पढ़ाया करता था।
रामदीन कहा करता था, “घर ईंट-पत्थर से नहीं बनता। घर बनता है बाँटने से—रोटी बाँटो, दुःख बाँटो, खुशियाँ बाँटो।”
उसकी पत्नी शांति हँसकर कहती, “और जमीन?”
रामदीन मुस्कुराता, “जमीन भी बाँट देंगे, पर दिल मत बाँटना।”
चार बच्चे थे—दो बेटे, अरुण और मोहन, और दो बेटियाँ, सरोज और मीरा।
समय बीतता गया। बच्चों की शादियाँ हुईं। सब अपनी-अपनी दुनिया में चले गए। लेकिन रामदीन और शांति के लिए वह पुराना घर हमेशा सबका घर रहा। रामदीन ने जीवन भर खेती की। कभी किसी से उधार लिया तो समय पर लौटाया। बच्चों की पढ़ाई, बेटियों की शादी, बेटों का कारोबार—जहाँ जितना बन पड़ा, उसने सबके लिए किया। उसे यह गिनना कभी नहीं आया कि किस पर कितना खर्च किया।
फिर एक बरसात की रात रामदीन चला गया। घर में पहली बार नीम का पेड़ भी जैसे चुप था। तेरहवीं के बाद एक दिन अरुण ने कागज़ों की फाइल मेज पर रखी।
“अब हिसाब कर लेना चाहिए,” उसने कहा। मोहन ने तुरंत सिर हिलाया, “हाँ, अब जो जिसका है, उसे मिल जाना चाहिए।”
सरोज चुप रही।
मीरा ने पूछा, “बाबूजी ने कुछ लिखा था?”
अरुण ने आँखें नीची करके कहा, “लिखा तो कुछ नहीं था। अब जो कानून और रिवाज है, वही होगा।”
शांति वहीं चारपाई पर बैठी सब सुन रही थी। उसने धीरे से पूछा, “कौन-सा रिवाज?”
अरुण बोला, “माँ, बेटियाँ तो अपने घर की हो गईं। यह घर और जमीन तो बेटों की ही हुई न।”
कमरे में अचानक जैसे हवा रुक गई।
मीरा ने भाई की ओर देखा। “हम बाबूजी की बेटियाँ थीं,” उसने धीमे से कहा।
मोहन हँस पड़ा। हँसते हुए कहने लगा बहन, भावुक मत बनो। शादी में जो मिला, कम मिला क्या?
मीरा के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति उतर आयी। “तो क्या बेटी को उसके पिता की जिंदगी से सिर्फ इसलिए बाहर कर देना चाहिए क्योंकि उसकी शादी हो गई?”
कोई जवाब नहीं आया। उस रात शांति सो नहीं सकी। उसकी आँखों के सामने अपने पति का चेहरा घूमता रहा।
रामदीन सचमुच सब बाँटता था। बचपन में आम आते तो बच्चों में बराबर बाँटता। फसल अच्छी होती तो मजदूरों को भी हिस्सा देता। पड़ोसी की बेटी की शादी हो तो चुपचाप अनाज पहुँचा आता। किसी गरीब की गाय बीमार हो तो डॉक्टर बुला देता और आज उसके अपने बच्चे उसके हिस्से की जमीन बाँटने बैठे थे।
अगली सुबह शांति ने चारों को बुलाया। “तुम लोगों को जमीन चाहिए?”
अरुण ने कहा, “माँ, बात जमीन की नहीं, व्यवस्था की है।”
शांति मुस्कुराई।
“व्यवस्था?”
उसने सामने रखी पुरानी संदूकची खोली।
उसमें कपड़ों के नीचे कई छोटी-छोटी पर्चियाँ थीं।
“यह क्या है?” मीरा ने पूछा।
शांति ने एक पर्ची अरुण को दी।
उस पर लिखा था—
‘अरुण की पढ़ाई के लिए—₹18,000।’
दूसरी पर्ची मोहन को दी।
‘मोहन की दुकान के लिए—₹35,000।’
फिर बेटियों की पर्चियाँ निकलीं।
‘सरोज की शादी—₹42,000।’
‘मीरा की पढ़ाई और शादी—₹47,000।’
मोहन ने कहा, “माँ, यह सब क्या साबित करता है?”
शांति ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “कुछ नहीं। क्योंकि तुम्हारे पिता ने कभी तुमसे हिसाब नहीं माँगा।”
कमरे में फिर खामोशी छा गई। तभी शांति ने काँपती आवाज़ में कहा, “उन्होंने जीवन भर सब बाँटा। लेकिन तुम लोग आज उनका आखिरी हिस्सा भी बाँटने से पहले यह भूल गए कि उन्होंने तुम्हें बराबर प्यार दिया था।”
अरुण ने झुंझलाकर कहा, “माँ, हम आपका हिस्सा तो रखेंगे ही।”
शांति ने उसकी ओर देखा।
“मेरा?”
फिर उसकी आँखें भर आईं।
“मेरा हिस्सा कौन-सा है बेटा? यह घर? यह जमीन? या तुम चारों?”
कोई बोल नहीं पाया।
शांति उठी और आँगन में चली गई।
नीम के नीचे खड़े होकर उसने कहा,
“तुम्हारे पिता कहते थे—दिल मत बाँटना।”
वह रुकी।
“पर तुम लोगों ने जमीन बाँटने से पहले ही दिल बाँट लिए।”
कुछ दिन बाद गाँव के वकील को बुलाया गया।
कागज़ सामने रखे गए।
वकील ने साफ कहा कि बेटियों का भी अधिकार है।
अरुण और मोहन के चेहरे उतर गए।
सरोज ने कहा, “मुझे जमीन नहीं चाहिए।”
मीरा ने उसकी ओर देखा।
“मुझे भी नहीं।”
अरुण ने राहत की साँस ली। लेकिन मीरा ने आगे कहा, “हमें जमीन नहीं चाहिए, हमें अपना अधिकार चाहिए।”
“क्यों?” मोहन ने ताना मारा।
मीरा ने कहा, “ताकि यह साबित हो कि हम इस घर की बेटियाँ थीं, मेहमान नहीं।”
शांति की आँखों से आँसू बह निकले।
वह पहली बार मुस्कुराई।
कानूनी बँटवारा हुआ।
घर चार हिस्सों में बाँटा गया। खेत भी। लेकिन सबसे कठिन बँटवारा कागज़ पर नहीं हुआ था। वह लोगों के भीतर हो चुका था। कुछ महीनों तक भाई-बहन एक-दूसरे से ठीक से बात नहीं करते रहे।
त्योहार आया तो घर खाली-खाली लगा। नीम के पेड़ के नीचे चारपाई पड़ी रही। फिर एक दिन शांति बहुत बीमार पड़ गई।
चारों बच्चे एक साथ उसके पास पहुँचे।
अरुण उसका हाथ पकड़े बैठा था।
मोहन दवा लेने गया था।
सरोज उसके सिर में तेल लगा रही थी।
मीरा उसके पैरों के पास बैठी थी।
शांति ने आँखें खोलीं।
चारों को देखा।
और बहुत धीमे से पूछा— “अब बताओ… कौन बहन और भाई किसका?”
चारों की आँखें झुक गईं।
शांति बोली, “तुम्हारे पिता की जमीन का हिस्सा तुमने बाँट लिया। अब क्या उनके सपने भी बाँटोगे?”
अरुण रो पड़ा।
“माँ… गलती हो गई।”
मोहन ने पहली बार मीरा का हाथ पकड़ लिया।
“बहन, हमें माफ कर दो।”
मीरा ने कुछ नहीं कहा।
बस भाई के हाथ को कसकर पकड़ लिया।
शांति ने आँखें बंद कर लीं।
उसके चेहरे पर संतोष था।
कुछ देर बाद उसने कहा,
“देखा… हिस्सा बाँटने से रिश्ता नहीं टूटता। रिश्ता तब टूटता है जब इंसान दूसरे का हक मारता है।”
बाहर नीम से एक सूखा पत्ता गिरा। आँगन में हल्की हवा चली।
और बरसों बाद उस घर में चारों भाई-बहनों की आवाज़ एक साथ सुनाई दी। जमीन चार हिस्सों में बँट चुकी थी।
लेकिन उस दिन पहली बार उन्हें समझ आया—
हक़ बाँटने से घर नहीं टूटता।
लालच बाँटने से घर टूटता है।
और रिश्तों की सबसे बड़ी विरासत जमीन नहीं होती— एक-दूसरे का हक़ बचाए रखना होता है।