“खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी”– सुभद्राकुमारी चौहान

सुभद्राकुमारी चौहान जी की जयन्ती १६ अगस्त पर विशेष आयोजन

प्रयागराज। महान् स्वतन्त्रासेनानी एवं कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने १६ अगस्त, १९०४ ई० को नागपंचमी के दिन इलाहाबाद के एक ग्रामीण-क्षेत्र निहालपुर मे ज़मीन्दार पिता रामनाथ सिंह के यहाँ हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इलाहाबाद मे ही हुई थी। वे यहीँ के क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल के छात्रावास मे महादेवी वर्मा के साथ रहती थीँ। यद्यपि वे कनिष्ठ थीँ तथापि महादेवी उनकी सहेली थीँ। दोनो ही कवयित्री थीँ, इसलिए अन्तरंगता स्वाभाविक थी।

१९१९ ई० मे खण्डवा (मध्यप्रदेश) के ठाकुर नाटककार लक्ष्मण सिंह के साथ विवाह हो जाने के बाद वे जबलपुर चली आयीँ और स्वतन्त्रतासंग्राम के साथ आ जुड़ीँ। उनकी स्मृति मे ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन किया गया।

परिसंवाद का आरम्भ करते हुए आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने बताया– सुभद्रा का व्यक्तित्व आरम्भ से ही साहसिकता और स्वाभिमान से भरा हुआ था। उन्होँने अपने विवाह के डेढ़ वर्ष पश्चात् ही अपने पति की तरह देश के आज़ादी-आन्दोलन मे कूद पड़ीँ। वे गांधी जी से प्रभावित थीँ, जिनके आह्वान पर उन्होँने अपने सारे आभूषण देशसेवा मे अर्पित कर, विदेशी वस्त्रोँ का त्याग कर दिया था। मात्र सत्रह वर्ष की अवस्था मे महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित होने वाली वे देश की वे प्रथम सत्याग्रही किशोरी थीँ। यही नहीँ, जबलपुर के टाउनहॉल मे झण्डा-सत्याग्रह के दौरान बन्दिनी बनाकर कारागार भेजी जानेवाली प्रथम महिला सत्याग्रही बनीँ। उनका स्वतन्त्रता-संग्राम और साहित्यसेवा समान रूप से चलता रहा। मात्र नौ वर्ष की अवस्था मे उनकी प्रथम कविता इलाहाबाद से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘मर्यादा’ मे ‘नीम’ शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। उनका प्रथम काव्यसंग्रह ‘मुकुल’ वर्ष १९३० मे प्रकाशित हुआ था। उनकी सर्वाधिक चर्चित कविता “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसीवाली रानी थी” रही। उनके सम्मान मे भारतीय डाक-तारविभाग ने ६ अगस्त, १९७६ ई० को २५ पैसे का डाक-टिकट भी प्रसारित किया था। उन्हेँ ‘सेक्सरिया पारितोषिक’ से सम्मानित किया गया था। १५ फ़रवरी, १९४८ ई० को सिवनी मे एक कार-दुर्घटना मे उनका निधन हो गया था।

जबलपुर से सहायक प्राध्यापक प्रो० रचना तिवारी ने बताया– सुभद्रा जी के काव्यत्व और व्यक्तित्व मे देशप्रियता कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे जेलयातना से घबरायीँ तक नहीँ।

राजकोट (गुजरात) से आलोचक डॉ० कीर्तिवर्द्धन ने बताया– सुभद्रा जी के स्वभाव मे ही विद्रोह था, जो इलाहाबाद-जैसी क्रान्तिभूमि की देन है, फिर जबलपुर मे उनके सत्याग्रही पति और राष्ट्रीय कवि माखनलाल चतुर्वेदी का साथ उन्हेँ क्रान्तिकारी बनाने मे सहयोगी रहा।