।प्रयागराज। एक ख़ूबसूरत एहसास का नाम है, फ़िराक़। ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई के साथ-साथ, समालोचना और इतिहास पर भी क़लम चलानेवाले रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी यदि ज़िन्दा हैँ तो अपनी शाइरी मे। ‘गुल-ए-नग़्मा’, ‘मश्अल’, ‘नग़्म-ए-साज़’, ‘गुलबाग़’, ‘रूप’ को रचते हुए जिया तो ‘साधु और कुटिया’ ‘सत्यं-शिवं-सुन्दरम्’ के यथार्थ को भोगा भी। वे ताक़यामत अपनी इन कृतियोँ मे ज़िन्दा रहेँगे। ऐसे शाइर के जन्मदिनांक २८ अगस्त के अवसर पर ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान मे ‘अज़ीम शाइर फ़िराक़ गोरखपुरी और उनका सार्वकालिक रचनाकर्म’-विषयक एक राष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन ‘सारस्वत सदन-सभागार, आलोपीबाग़, प्रयागराज से किया गया था।
उर्दू-विभाग, अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के निवर्तमान अध्यक्ष प्रो० सग़ीर अफ़्राहिम ने मुख्य अतिथि के रूप मे कहा– फ़िराक़ साहिब की रचनाओँ मे प्राकृतिक चित्रण नयेपन के साथ है। उनमे जीवन-मरण, ज़िन्दगी की सच्चाई तथा जीवनमूल्य का बोध प्रतिबिम्बित होता है।
उर्दू ऐकडेमी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय मे निदेशक प्रो० राहत अबरार ने अध्यक्ष के रूप मे बताया– फ़िराक़ साहिब की शाइरी मे विविध प्रकार के हिन्दुस्तानी रंग दिखते हैँ। उनकी कृतियाँ संस्कृत-श्लोक की भाव-प्रवणता से प्रभावित दिखती हैँ। उनकी यही विविधता उन्हेँ दूसरोँ से बड़ा बना देती है।
इस सारस्वत आयोजन मे विशिष्ट अतिथि शाइर श्रीराम मिश्र 'तलब जौनपुरी' ने बताया– 'फ़िराक़ गोरखपुरी : उर्दू कविता' एक बहुत ही प्रसिद्ध पुस्तक है, जिसमे उन्होँने उर्दू-कविता के विविध पहलुओँ पर सम्यक् प्रकाश डाला है, जो पाठकोँ को उर्दू-साहित्य के बारे मे महत्त्वपूर्ण जानकारी देने मे अत्यन्त सहायक सिद्ध हो रही है।
आयोजक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा– फ़िराक़ साहिब अशुद्ध हिन्दी बोलनेवालोँ को पसन्द नहीँ करते थे। वे ग़लत उर्दू और अँगरेज़ी बोले अथवा लिखे जाने पर डाँट पिलाने से भी नहीँ चूकते थे। उनका मत था कि सही उच्चारण के लिए फ़ारसी और संस्कृत का ज्ञान आवश्यक है, हालाँकि उन्होंने संस्कृत-साहित्य भी अँगरेज़ी-माध्यम मे ही पढ़ा था।
आकाशवाणी, प्रयागराज के उद्घोषक कुँवर तौक़ीर अहमद ख़ान ने कहा– फ़िराक़ साहिब ने न सिर्फ़ भाषा की दीवारेँ तोड़ीँ, बल्कि राष्ट्रीय एकता और स्वतन्त्रता-आन्दोलन मे भी अपनी आवाज़ बलन्द की थी; डेढ़ वर्ष तक कारावास की ज़िन्दगी भी जी थी।
प्रयागराज मे ईश्वरशरण डिग्री कॉलेज मे प्राध्यापक डॉ० सय्यद हसीन जिलानी ने कहा– फ़िराक़ गोरखपुरी ने उर्दू-शाइरी मे हिन्दुस्तानी तहज़ीब को बहुत ही सलीक़े के साथ पेश किया है। यही कारण है कि उनकी कृति 'रूप' की रुबाइयाँ' हिन्दुस्तानी रस्मो रिवाज़ मे रची-बसी हैँ।