यादों की गली मे डॉ० पवन विजय

जोगीबीर के लेखक के जन्मदिन पर विशेष लेख!

डॉ पवन विजय सर (जौनपुर वाले) समाज विज्ञान के प्रोफेसर हैं और मैं अभी भी छात्र। वह कई बेस्ट सेलर पुस्तकों के लेखक और अकादमी पुरस्कार विजेता हैं। साथ ही समाजसेवी, सनातन के सजग प्रहरी और विभिन्न टीवी चैनलों पर अपनी बात सशक्त ढंग से रखने वाले विद्वान विश्लेषक भी हैं।

हम दोनों में बस एक ही समानता है कि दोनों अवधी बोलने वाले हैं (हालांकि मेरी अवधी में बैसवारी का पुट है और उनकी अवधी में कुछ शब्द भोजपुरी के ‘ढुका’ गए हैं)। यह भी कि हम दोनों दिल्ली में रहते हैं और अपने-अपने गांव से यह संकल्प करके निकले थे कि-“एक दिन संसार जीतकर वापस अपने गांव आऊंगा।” लेकिन यह हो न सका औऱ ‘शिखर पर बैठने के लिए पतित हुए हम। ‘फिर “कट गया मैं, हट गया मैं, खेत से खलिहान से। ओस भीगी दूब से,षहंसिया, कुदाली धान से।

“पर अपने घर, गांव, गोरु, बछेरू, खेत, खलिहान, चौपाल, समाज, क्षेत्र की कसक जब- तब दिल्ली के कंक्रीट जंगल में बरबस आ ही आती है। कूड़े के ढेर पर बैठे इस शहर के कान फोड़ू शोर के मध्य कजरी, सोहर, फाग और आल्हा के मन मुदित कर देने वाले स्वरों की हूक गाहे- बेगाहे दिल के किसी ताख, किसी आले, किसी कोने से उभर ही आती है- “हाय गँवई गाँव का गायक कहाँ है, हाय लक्षमन राम का शायक कहाँ है।”

डॉ. पवन विजय की पुस्तक ‘जोगी बीर’ एकाग्रचित्त होकर शब्द- दर- शब्द पढ़ी। कभी इसमें डूब रहा हूँ, कभी उतरा रहा हूँ। क्योंकि इसे सरसरी तौर पर पढ़ने का मतलब है:-गुड़ की ताजी बनी भेली को बिना स्वाद लिए निगल जाना, चने के होरा को एक बार में मुट्ठी भर फांक जाना, ऊँख को पोर-पोर चुहने के बजाय बर्फ वाला बेस्वाद जूस बनाकर पी जाना।

‘जोगी बीर’ पढ़कर यूँ लगता है मानो किसी ने गांव से शहर कमाने आये तमाम लोगों की वेदना को स्वर दे दिया हो, मानो उनकी भावनाओं को शब्द दे दिया हो। अगर यही बात मैं कहता तो अक्षरों से यूँ प्रतिबिंब न गढ़ पाता, भावनाओं का ज्वार यूँ न बहता मेरी कलम से। प्रकृति का यूँ मनमोहक, जादुई चित्रण न कर पाता मैं। शायद ‘बांस में पूर्वज, ‘गूलर’ में चमत्कारी परी और ‘जामुन’ में अपना बचपन न देख पाता मैं। संभवतः मैं बादल, बारिश, ओस, सांझ, रात, सूर्यास्त और सूर्योदय का इतना मनमोहक मानवीकरण भी न कर पाता। संभव यह भी था कि मेरी स्मृतियों के रेखाचित्र इतने सजीव न होते, यादों की गठरी इतनी सुकोमल और अनमोल न होती। “जांगर, ओरी, भदभदा, पेट- पोंछना, सीधा- पिसान, साइत -सकाल, हारी-बिमारी” जैसे तमाम बिसरा दिए गए देशज शब्दों को अपने किस्सों में इतनी खूबसूरती से न पिरो पाता मैं। लोकगीतों की मिठास, गारियों का सुवाद अपने लेख में यूँ सुघड़ता से न उड़ेल पाता मैं।

डॉ. पवन विजय की पुस्तक ‘जोगी बीर’ आपको अपनी मिट्टी से, अपनी जड़ों से, अपनी लोक परंपराओं से, अपने रीति रिवाजों से जोड़ती है। यह पुस्तक पाठक को कभी बचपन की सैर कराती है, उस समय की सुखद स्मृतियों को पुनः ताजा कराती है तो कभी हमारे परिवार और समाज के आदर्श, मर्यादित स्वरूप को सामने रखती है। ‘मायका’, ‘एक सुख पाया मैंने’, ‘पुत्र-ऋण’ हमें किसी यूटोपिया में ले जाते है। ‘महाप्रयाण’ एक अविश्वसनीय सच का सामना कराती है और ‘न्याय का बल्लम’ समाज और देश की एक बड़ी समस्या का प्रायोगिक और साहसी समाधान सुझाती है। ‘उपरेहित’ त्याग की खरी कसौटी गढ़ता है तो ‘आखिरी मां’ भावहीन समाज और यंत्रवत मनुष्यों का भयावह भविष्य दिखाती है। ‘जाया तत्व’ मन के सबसे कोमल भावों, कन्या तत्व को कुरेदता है।

पुस्तक का प्रत्येक लेख , स्मृति हृदय के किसी अनछुए हिस्से को सहलाता है, गुदगुदाता है, दुलराता है। पचपन की वय का दिल भी कुछ समय के लिए बचपन का हो जाता है। जोगी बीर का ताज़ा, सोंधा ‘रसियाउर’ खाते हुए पाठक जब ‘ललकी बरफ’ का अलौकिक स्वाद चखते हैं तो मन-मिरगा नाच उठता है। होंठ और जीभ लाल हो जाते हैं, मन मह-मह कर महक उठता है। पुस्तक को खुद मन भर के पढ़ लिया है। पेट भर गया है पर प्यास अभी भी नहीं बुझी गया। जब स्मृतियों की खुमारी टूटेगी, भावनाओं का ज्वर कुछ थमेगा, तब फिर से पढूंगा। फिलहाल अगली पीढ़ी यानि बिटिया और बेटे की जोगी बीर को लौंग-फूल चढ़ाने, धार देने और उनका ‘धरम मनाने’ को दे दिया है।