नारी-शक्तीकरण : एक सम्पूर्ण जीवन-दर्शन

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय (भाषाविद्-समीक्षक), इलाहाबाद-


वस्तुत: परिवार, समाज, राज्य तथा राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में नारी-समुदाय की प्रमुख भूमिका रही है परन्तु इस लक्ष्य तक पहुँचने में उन्हें दीर्घकालीन ऐतिहासिक संघर्ष करना पड़ा है। वह नारी, जो कभी परिस्थितियों का मूक दर्शक हुआ करती थी और अशिक्षा, सती-प्रथा, पर्द:प्रथा, बाल-विवाह, विधवा-विवाह, यौन-उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, दहेज-प्रथा, विवाहसम्बन्ध-विच्छेद, परित्यक्ता-जीवन, व्यभिचार, बलात्कार, हत्या आदिक न जाने कितने ही अमानवीय आचरण उसे ग्रस्त और त्रस्त कर, उसके अस्तित्व को चुनौती देते आ रहे हैं। उसके बाद भी आन्दोलनों और सुधारों के फलस्वरूप उसके जीवन में आत्मनिर्णय के अधिकार का संचार हुआ है; उसने अपने मौन को तोड़ा; निष्क्रियता को समाप्त किया तथा अपनी नियति बदलने का साहस प्रदर्शित किया है।
आधुनिक नवजागरण के परिणामस्वरूप नारी-जीवन का नया अध्याय लिखा गया है। नारी के जीवन में व्याप्त विषमता, शोषण तथा यातना के विरुद्ध वातावरण बना है। इस दिशा में शासनिक-आशासनिक स्तर पर प्रयास प्रारम्भ हुए हैं परन्तु सत्ता की राजनीति के आधार पर। नारी के अनवरत संघर्ष और कतिपय उदारवादी पुरुषवर्ग के स्नेह-सौजन्य के कारण आज एक सीमा तक नारी की स्वतन्त्र पहचान बनी है। उन्हें शक्ति, प्रतिष्ठा तथा शक्ति अर्जित हुई हैं। निश्चय, शक्ति तथा अधिकार के लिए संघर्ष करके नारी ने अपने जीवन के अर्थ बदल दिये हैं। इसके बाद जो भी परिवर्त्तन हुआ है, उसे ‘मात्रात्मक परिवर्त्तन’ ही कहा जा सकता है, गुणात्मक विकास अभी शेष है। नारी-जीवन का अधिकांश भाग नियतिवादी जीवन जीने के लिए विवश है। नारी का संसार अशिक्षा, अन्धविश्वास, कुपोषण तथा पराधीनता का पर्याय बना हुआ है।
आँकड़ों पर यदि विश्वास किया जाये तो ज्ञात होता है कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग ५,००० नारियाँ दहेज-हत्याओं में मारी जाती हैं। परिवार में कन्या का जन्म आज भी अभिशाप बना हुआ है। बालकों की तुलना में बालिकाओं के लिए अनेक वर्जनाएँ और विषमताएँ विद्यमान हैं। सत्य यह है कि औसत भारतीय नारी आज भी पुरुष-वर्ग पर निर्भर करती है। उसे निर्णय करने की स्वतन्त्रता नहीं है। इन सारे सन्दर्भों को देखते हुए, यह सुस्पष्ट प्रतीत होता है कि मात्र कतिपय अधिकार दे देना, नारी-शक्तीकरण के लिए पर्याप्त नहीं है। वह जब तक स्वयं को आत्मनिर्भर करने में समर्थ नहीं होती; जब तक व्यापक स्तर पर, नारी-जीवन सुख और समृद्धि का प्रतीक नहीं बन जाता तब तक यह लक्ष्य अपूर्ण बना रहेगा।
निस्सन्देह, नारी-शक्तीकरण एक सम्पूर्ण जीवन-दर्शन है। इस लक्ष्य की प्राप्ति सहायता, प्रतिवेदन तथा संरक्षण के सहारे ही नहीं हो सकती, अपितु उसके जीवन में स्वतन्त्रता, समानता तथा सहभागिता के कारकों को विकसित करना होगा और आधी-अधूरी अथवा सीमित प्रगति यथा स्थितिवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं है। इस आधार पर व्यवस्था का मूलभूत ढाँचा न तो बदल सकता है और न ही नारी पूरी सद्इच्छा और स्वविवेक से वांछनीय मार्ग को चुनकर आगे बढ़ सकती हैं।
इस यथार्थ से हम अपनी आँखें चुरा नहीं सकते कि समय-परिवर्त्तन के साथ नारी-समुदाय ने एक ऊँची और लम्बी छलाँग लगायी है और अपनी नियति के पक्ष में सर्जन कर रही है। नारी होने का अर्थ बदला है; उसका व्यक्तित्व परिमार्जित हुआ है तथा सोच-विचार और चिन्तन की सीमा व्यापक हुई है। सामाजिक इकाइयों के बीच नारी सुखद जीवन जीने का स्वप्न देख रही है। नारी-विमर्श सतत सक्रिय है; राष्ट्रीय महिला आयोग अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है। उनके संवैधानिक अधिकारों को निश्चित किया जा चुका है। संसद् में नारी-कल्याण से सम्बन्धित अनेक क़ानून बनाये गये हैं, जबकि शासन ने इस दिशा में स्वाधार, स्वयंसिद्ध, स्वशक्ति, सुरक्षित मातृत्व-जैसी कई योजनाएँ क्रियान्वित की हैं। आज नारी-समुदाय के लिए पंचायतों में एक-तिहाई आरक्षण प्राप्त है, जबकि विधानमण्डलों और संसद् में आरक्षण-विषयक प्रस्ताव लम्बित हैं। प्रश्न ये हैं : नारी-समुदाय को आज जो भी अधिकार और दायित्व सौंपे जा रहे हैं, वे आक्रोश, प्रदर्शन, प्रतिरोध, याचना तथा संरक्षण के बदले में ही क्यों? क्या नारी के रूप में उन्हें उनकी स्वतन्त्र सत्ता को सौंपने में पुरुष-वर्ग की अहम्मन्यता सामने आ रही है? इन प्रश्नों के रूप में वास्तविक अवरोध यही हैं, जिनके कारण आज नारी-जीवन में ‘दोहरा मानदण्ड’ बना हुआ है। इसे तोड़ने के लिए नारी-जाति को पूर्णत: स्वयत्तता सौंपनी होगी।
नारी-विकास में शक्तीकरण और स्वावलम्बन की प्रक्रिया अनिवार्य है, जिसे बृहद् अर्थों में ग्रहण करना होगा। नारी-जीवन में रचनात्मक विकास की सम्भावनाएँ बढ़नी चाहिए। शक्त नारी का अर्थ जीवन के स्वस्थ और सन्तुलित प्रतिमान हो सकते हैं। यदि परिस्थितियाँ उनकी विकास-यात्रा को बाधित करती हैं तो प्रबल आवेग के साथ ऐसे दुष्चक्र को तोड़ना, समय की माँग है। उन्हें अपने विरुद्ध बुराइयों से लड़ने के लिए दृढ़ निश्चयी होना पड़ेगा। उन्हें न केवल साहसिक क़दम उठाने होंगे अपितु नारी-अस्तित्व की अवधारणा को मुक्त भाव के साथ परिभाषित करते रहना होगा। उत्कृष्ट नारी-जीवन-हेतु जिजीविषा और जिगीषा का होना अति आवश्यक है। कल्याणकारी कार्यक्रमों को तीव्रता प्रदान कर, इस स्वप्न को साकार किया जा सकता है। उत्तमता और गुणवत्ता की सतत सक्रिया संकल्प ही नारी-अस्तित्व और अस्मिता को श्रेष्ठ बना सकता है।
इधर, कुछ वर्षों से नारी-जाति के मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसी विसंगतियाँ घर कर गयी हैं, जो उन्हें अपराध की दुनिया में आने के लिए विवश कर रही हैं। आये-दिन बालिकाओं का घर से भागना, असामाजिक तत्त्वों के साथ जुड़कर, बालिकाओं का आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त रहना, भौतिकवादी जीवन से कुप्रभावित होकर, अपने आचरण की सभ्यता को कलुषित कर, अपने घर-परिवार को कलंकित करना तथा भिन्न-भिन्न रूपों में कुमार्गगामिनी होना— ये सभी नकारात्मक प्रवृत्तियाँ नारी-जाति के उन्नयन की दिशा में अति बाधक हैं। निस्सन्देह, इसके लिए दो प्रकार के वातावरण उत्तरदायी हैं : पहला, अन्त: वातावरण और दूसरा, बाह्य वातावरण। इस ओर परिवार के बुद्धिमान और विवेकवान सदस्यों को चिन्ता करनी होगी कि उनकी पाल्या का किन-किनकी संगतियों में अपनी किस प्रकार की जीवन-पद्धति है।
आज माता-पिता अपनी-अपनी ही समस्याओं और प्राथमिकताओं को लेकर इतने व्यस्त और उलझे हुए हैं कि जिन सन्तानों के भविष्य के लिए वे पाप-पुण्य अर्जित कर रहे होते हैं, उनके प्रति उनकी व्यावहारिक दृष्टि का प्रभाव प्रत्यक्ष होता ही नहीं। यही कारण है कि अपेक्षित और वास्तविक संरक्षण के अभाव में वही बालिका कुमार्गगामिनी हो जाती है। आगे चलकर, वह अपना संस्कार भी सँभाल नहीं पाती।
अस्तु, भारतीय समाज को नारी-जाति के प्रति सहिष्णु बनना होगा और उसकी प्रत्येक आह और संवेदना में एकरूप रहकर, उसे उसके लक्ष्य तक ले जाने के लिए उसे आत्मनिर्भर करना होगा। इसमें सर्वाधिक भूमिका नारी-जाति की दिखनी होगी।
देश की सरकारें सत्ता की राजनीति करती आ रही हैं; प्रतिवर्ष महिला दिवस, बालिका दिवस आदिक के उत्सव मनाकर सरकारें अपनी पीठ ठोंकवाने में कुशल और चतुर रही हैं, अन्यथा प्रथम पंचवर्षीय योजना से आज तक ‘नारी-प्रगति’, ‘नारी-सुरक्षा और संरक्षा’ की दिशाओं में यदि ईमानदारी के साथ सरकारों ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया होता तो हम इस विषय पर आज ‘नारी : अस्तित्व-अस्मिता की तलाश में’ विषयक यह लेख नहीं लिख रहे होते।
निष्पत्ति यह है कि वर्तमान परिदृश्य को समझते हुए, बालिका-वर्ग को गम्भीरता के साथ अपने भविष्य को एक नया रूप देने के लिए ‘संघर्ष-पथ’ पर स्वाभिमान की रक्षा करते हुए, आगे बढ़ते रहना होगा, समय-शिला पर ऐसी ही बालिकाएँ, वय-वार्द्धक्य के साथ अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कराती रही हैं।



सम्पर्क-सूत्र : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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